श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 32

 
श्लोक
किं नस्तपश्चीर्णमधोक्षजार्चनं
पूर्तेष्टदत्तमुत भूतसौहृदम् ।
यत्सम्परेत: पुनरेव बालको
दिष्टय‍ा स्वबन्धून् प्रणयन्नुपस्थित: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
किम्—किस तरह की; न:—हमारे द्वारा; तप:—तपस्या; चीर्णम्—दीर्घकाल तक की गई; अधोक्षज—भगवान् की; अर्चनम्—पूजा; पूर्त—सडक़ें बनवाना इत्यादि.; इष्ट—जनकल्याण कार्य; दत्तम्—दान देना; उत—अथवा और कुछ; भूत सौहृदम्—जनता के प्रति प्रेम होने से; यत्—जिसके कारण; सम्परेत:—मृत्यु को प्राप्त होने पर भी; पुन: एव—फिर से, अपने पुण्यों के कारण; बालक:—बालक; दिष्ट्या—भाग्य द्वारा; स्व-बन्धून्—निजी सम्बन्धियों को; प्रणयन्—प्रसन्न करने के लिए; उपस्थित:—यहाँ उपस्थित है ।.
 
अनुवाद
 
 नन्द महाराज तथा अन्य लोगों ने कहा : हमने अवश्य ही पूर्वजन्म में दीर्घकाल तक तपस्या की होगी, भगवान् की पूजा की होगी, जनता के लिए सडक़ें तथा कुएँ बनवाकर पुण्य कर्म किये होंगे और दान भी दिया होगा जिसके फलस्वरूप मृत्यु के मुख में गया हुआ यह बालक अपने सम्बन्धियों को आनन्द प्रदान करने के लिए लौट आया है।
 
तात्पर्य
 नन्द महाराज ने पुष्टि की कि पुण्य कर्मों से मनुष्य साधु बन सकता है, जिससे वह घर में सुखी रह सकता है और उसके बाल-बच्चे सुरक्षित रह सकते हैं। शास्त्र में कर्मियों तथा ज्ञानियों के लिए, विशेष रूप से कर्मियों के लिए अनेक आदेश हैं जिनसे वह पवित्र बन सकते हैं और भौतिक जीवन में भी सुखी हो सकते हैं। वैदिक सभ्यता के अनुसार मनुष्य को चाहिए कि जनता के लाभ के लिए
कार्य करे—यथा सडक़ें बनवाये, सडक़ों के दोनों ओर वृक्ष लगवाये जिससे लोग छाया में चल सकें, सार्वजनिक कुँए खुदवाये जिससे हर एक को बिना किसी कठिनाई के जल मिल सके। अपनी इच्छाओं को वश में रखने के लिए मनुष्य को तपस्या करनी चाहिए और उसी के साथ साथ भगवान् की पूजा करनी चाहिए। इस तरह वह पवित्र बन जाता है और उसी के फलस्वरूप वह भौतिक जीवन में भी सुखी हो सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥