श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 33

 
श्लोक
द‍ृष्ट्वाद्भ‍ुतानि बहुशो नन्दगोपो बृहद्वने ।
वसुदेववचो भूयो मानयामास विस्मित: ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
दृष्ट्वा—देखकर; अद्भुतानि—अतीव अद्भुत घटनाओं को; बहुश:—अनेक बार; नन्द-गोप:—गोपों के मुखिया नन्द महाराज; बृहद्वने—बृहद्वन में; वसुदेव-वच:—वसुदेव के वचन, जो उन्होंने मथुरा में नन्द से कहे थे; भूय:—बारम्बार; मानयाम् आस— मान लिया कि कितने सच थे; विस्मित:—अतीव विस्मय में ।.
 
अनुवाद
 
 बृहद्वन में इन सारी घटनाओं को देखकर नन्द महाराज अधिकाधिक आश्चर्यचकित हुए और उन्हें वसुदेव के वे शब्द स्मरण हो आये जो उन्होंने मथुरा में कहे थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥