श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 7

 
श्लोक
अध:शयानस्य शिशोरनोऽल्पक-
प्रवालमृद्वङ्‍‍घ्रिहतं व्यवर्तत ।
विध्वस्तनानारसकुप्यभाजनं
व्यत्यस्तचक्राक्षविभिन्नकूबरम् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
अध:-शयानस्य—गाड़ी (छकड़े) के नीचे सोये; शिशो:—बालक का; अन:—गाड़ी; अल्पक—अधिक बड़ा नहीं; प्रवाल— नई पत्ती की तरह; मृदु-अङ्घ्रि-हतम्—उनके सुन्दर मुलायम पाँवों से मारी गई; व्यवर्तत—उलट कर गिर गई; विध्वस्त—बिखर गई; नाना-रस-कुप्य-भाजनम्—धातुओं के बने बर्तन-भांडे; व्यत्यस्त—इधर-उधर हटे हुए; चक्र-अक्ष—दोनों पहिये तथा धुरी; विभिन्न—टूटे हुए; कूबरम्—शकट का कूबर (लट्ठा), जिसमें जुआ लगा रहता है ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीकृष्ण आँगन के एक कोने में छकड़े के नीचे लेटे हुए थे और यद्यपि उनके पाँव कोंपलों की तरह कोमल थे किन्तु जब उन्होंने अपने पाँवों से छकड़े पर लात मारी तो वह भड़भड़ा कर उलटने से टूट-फूट गया। पहिए धुरे से विलग हो गये और बिखर गये और गाड़ी का लट्ठा टूट गया। इस गाड़ी पर रखे सब छोटे-छोटे धातु के बर्तन-भांडे इधर-उधर छितरा गये।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस श्लोक की टीका इस प्रकार की है—जब कृष्ण अत्यन्त सुकुमार थे तो उनके हाथ-पाँव कोंपलों के समान थे फिर भी उनके पाँवों के छूने से ही गाड़ी खण्ड-खण्ड हो गई। ऐसा उनके लिए बिलकुल सम्भव था और इसमें उन्हें अधिक परिश्रम भी नहीं करना पड़ा। अपने वामन अवतार में भगवान् को अपने पाँव को इतनी ऊँचाई तक बढ़ाना पड़ा था जिससे वह ब्रह्माण्ड के आवरण में प्रवेश कर सके। इसी तरह जब भगवान् ने हिरण्यकशिपु को मारा तो उन्हें नृसिंहदेव के रूप में विशेष स्वरूप धारण करना पड़ा था। किन्तु कृष्ण अवतार में भगवान् को इतनी शक्ति व्यय नहीं करनी पड़ी। इसीलिए—कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्—कृष्ण स्वयं भगवान् हैं। अन्य अवतारों में भगवान् को देश तथा काल के अनुसार कुछ शक्ति व्यय करनी पड़ी किन्तु इस अवतार में उन्होंने असीम शक्ति का प्रदर्शन किया। इसीलिए छकड़ा चूर चूर हो गया, उसके जोड़ टूट गये और उसके ऊपर रखे धातु के बर्तन-भांडे छितरा गये।
वैष्णव-तोषणी की टीका में लिखा है कि यद्यपि छकड़ा बच्चे से ऊँचा था किन्तु बालक आसानी से पहिए छू सकता था और इतना ही पर्याप्त था असुर को पृथ्वी पर नीचे फेंकने के लिए। भगवान् ने एक ही साथ असुर को पृथ्वी पर फेंका और छकड़े को तोड़ डाला।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥