श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 7: तृणावर्त का वध  »  श्लोक 8

 
श्लोक
द‍ृष्ट्वा यशोदाप्रमुखा व्रजस्त्रिय
औत्थानिके कर्मणि या: समागता: ।
नन्दादयश्चाद्भ‍ुतदर्शनाकुला:
कथं स्वयं वै शकटं विपर्यगात् ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
दृष्ट्वा—देखकर; यशोदा-प्रमुखा:—माता यशोदा इत्यादि; व्रज-स्त्रिय:—व्रज की सारी स्त्रियाँ; औत्थानिके कर्मणि—उत्थान उत्सव मनाते समय; या:—जो; समागता:—वहाँ एकत्र हुए; नन्द-आदय: च—तथा नन्द महाराज इत्यादि सारे पुरुष; अद्भुत दर्शन—अद्भुत विपत्ति देखकर (कि लदी हुई गाड़ी बच्चे के ऊपर टूट कर गिर गई थी फिर भी बालक के चोट नहीं आई थी); आकुला:—अत्यन्त विचलित थे कि यह सब कैसे घटित हो गया; कथम्—कैसे; स्वयम्—अपने से; वै—निस्सन्देह; शकटम्—छकड़ा; विपर्यगात्—बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गया ।.
 
अनुवाद
 
 जब यशोदा तथा उत्थान उत्सव के अवसर पर जुटी स्त्रियों तथा नन्द महाराज इत्यादि सभी पुरुषों ने यह अद्भुत दृश्य देखा तो वे आश्चर्य करने लगे कि यह छकड़ा किस तरह अपने आप चूर चूर हो गया है। वे इसका कारण ढूँढने के लिए इधर-उधर घूमने लगे किन्तु कुछ भी तय न कर पाये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥