श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 70: भगवान् कृष्ण की दैनिक चर्या  » 

 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण की दैनिक चर्या तथा उनके समक्ष, पहला, द्वारका से आये दूत का तथा दूसरा, नारदमुनि द्वारा रखे गये दो प्रस्तावों का वर्णन हुआ है। भगवान्...
 
श्लोक 1:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जैसे जैसे प्रभात निकट आने लगा वैसे वैसे भगवान् माधव की सारी पत्नियाँ जो पति द्वारा गले में आलिंगित थीं, बाँग देते मुर्गों को कोसने लगीं। ये स्त्रियाँ विक्षुब्ध थीं क्योंकि अब वे उनसे विलग हो जायेंगी।
 
श्लोक 2:  पारिजात उद्यान से आने वाली सुगंधित वायु से उत्पन्न भौंरों की गुनगुनाहट ने पक्षियों को नींद से जगा दिया। और जब ये पक्षी जोर जोर से चहचहाने लगे, तो उन्होंने भगवान् कृष्ण को जगा दिया मानो दरबारी कवि उनके यश का गायन कर रहे हों।
 
श्लोक 3:  अपने प्रियतम की बाहों में लेटी हुई महारानी वैदर्भी को यह परम शुभ वेला नहीं भाती थी क्योंकि इसका अर्थ यह था कि वे उनके आलिंगन से विहीन हो जायेंगी।
 
श्लोक 4-5:  भगवान् माधव ब्राह्म मुहूर्त में उठा करते और जल का स्पर्श किया करते थे। तब स्वच्छ मन से वे एकाकी, आत्म-प्रकाशित, अनन्य तथा अच्युत परम सत्य ब्रह्म-रूप स्वयं का ध्यान करते, जो स्वभाव से ही सारे कल्मष को दूर करने वाला है और जो अपनी उन निजी शक्तियों के द्वारा, जो इस ब्रह्माण्ड का सृजन और संहार करती हैं, अपना ही शुद्ध तथा आनन्दमय स्वरूप प्रकट करता है।
 
श्लोक 6:  तब पुरुषों में अत्यन्त साधु सदृश भगवान् कृष्ण पवित्र जल में स्नान करते, अपने अधो वस्त्र तथा ऊपरी वस्त्र पहनते और प्रात:कालीन पूजा इत्यादि सारे नियमित क्रिया-कलाप सम्पन्न करते। फिर पवित्र अग्नि में आहुति देकर वे मन ही मन गायत्री मंत्र का जाप करते।
 
श्लोक 7-9:  प्रतिदिन भगवान् उदय होते सूर्य की पूजा करते और अपने अंशरूप देवताओं, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण करते। तत्पश्चात् आत्म-समृद्ध भगवान् अपने गुरुजनों तथा ब्राह्मणों की ध्यानपूर्वक पूजा करते। वे सुवस्त्राभूषित ब्राह्मणों को, पालतू तथा शान्त गौवों का झुंड दान में देते, जिनके सींग सोने से मढ़े होते और गले में मोतियों की मालाएँ रहती थीं। ये गौवें सुन्दर वस्त्रों से भी विभूषित रहतीं और उनके खुरों के अगले हिस्से चाँदी से मढ़े होते। ये प्रचुर दूध देने वाली तथा एक बार (ब्याँती) वाली होतीं और इनके साथ इनके बछड़े होते। भगवान् प्रतिदिन १३,०८४ गौवों के अनेक झुंड विद्वान ब्राह्मणों को देते और साथ में मलमल, मृगचर्म तथा तिल भी दान देते।
 
श्लोक 10:  भगवान् कृष्ण गौवों, ब्राह्मणों तथा देवताओं, अपने वरेषुजनों तथा गुरुओं और समस्त जीवों को—जो उन परम पुरुष के ही अंशरूप हैं—नमस्कार करते। तब वे शुभ वस्तुओं का स्पर्श करते।
 
श्लोक 11:  वे मानव समाज के आभूषण स्वरूप अपने शरीर को अपने विशेष वस्त्रों तथा रत्नों से और दैवी फूल-मालाओं एवं लेपों से सजाते।
 
श्लोक 12:  तब वे घी, दर्पण, गौवों तथा साँड़ों, ब्राह्मणों और देवताओं की ओर देखते और आश्वस्त होते कि महल के भीतर तथा पूरे नगर में रहने वाले सभी जातियों के लोग इन उपहारों से सन्तुष्ट तो हैं। तत्पश्चात् अपने मंत्रियों की इच्छाओं को पूरा करके उनका अभिवादन और सत्कार करते।
 
श्लोक 13:  सर्वप्रथम ब्राह्मणों को पुष्प-मालाएँ, पान तथा चन्दन-लेप बाँटकर इन्हीं उपहारों को अपने मित्रों, मंत्रियों तथा पत्नियों को देते और अन्त में स्वयं इनका उपभोग करते।
 
श्लोक 14:  तब तक भगवान् का सारथी उनके अत्यन्त अद्भुत रथ को ले आता जिसमें सुग्रीव तथा उनके अन्य घोड़े जुते होते। तत्पश्चात् उनका सारथी उन्हें नमस्कार करता और उनके समक्ष आ खड़ा होता।
 
श्लोक 15:  अपने सारथी के हाथों को पकड़ कर भगवान् कृष्ण सात्यकि तथा उद्धव के साथ साथ रथ पर इस तरह चढ़ते मानो सूर्य पूर्व के पर्वत (उदयाचल) पर उदय हो रहा हो।
 
श्लोक 16:  महल की स्त्रियाँ भगवान् कृष्ण को लजीली प्रेममयी चितवनों से देखतीं और इस तरह वे मुश्किल से उनसे छूट पाते। तत्पश्चात् वे अपने हँसीयुक्त मुख से उनके मन को चुराते हुए चल पड़ते।
 
श्लोक 17:  हे राजन्, भगवान् समस्त वृष्णियों के साथ साथ उस सुधर्मा सभाभवन में प्रवेश करते, जो उसमें प्रवेश करने वालों को भौतिक जीवन की छह तरंगों से रक्षा करता है।
 
श्लोक 18:  जब उस सभाभवन में सर्वशक्तिमान भगवान् अपने श्रेष्ठ सिंहासन पर विराजमान होते तो वे अपने अद्वितीय तेज से आकाश की दिशाओं को प्रकाशित करते हुए शोभायमान होते। पुरुषों में सिंह रूप यदुओं से घिर कर वे यदुश्रेष्ठ वैसे ही प्रतीत होते जैसे कि अनेक तारों के बीच चन्द्रमा।
 
श्लोक 19:  हे राजन्, वहाँ पर विदूषक विविध हास्य रसों का प्रदर्शन करके भगवान् का मनोरंजन करते, दक्ष नर्तक उनके लिए अभिनय करते और नर्तकियाँ ओजपूर्ण नृत्य प्रस्तुत करतीं।
 
श्लोक 20:  ये अभिनयकर्ता मृदंग, वीणा, मुरज, वंशी, मंजीरा तथा शंख की ध्वनि के साथ नाचते और गाते, जबकि पेशेवर कवि, मागध तथा वन्दीजन भगवान् के यश का गायन करते।
 
श्लोक 21:  कुछ ब्राह्मण उस सभाभवन में बैठ कर वैदिक मंत्रों का सस्वर पाठ करते और कुछ पूर्वकालीन पवित्र कीर्ति वाले राजाओं की कथाएँ कह कर सुनाते।
 
श्लोक 22:  हे राजन्, एक बार एक व्यक्ति उस सभा में आया जो इसके पूर्व वहाँ कभी नहीं देखा गया था। द्वारपालों ने उसके आने की जानकारी भगवान् को दी और तब वे उसे भीतर लेकर आये।
 
श्लोक 23:  उस व्यक्ति ने भगवान् कृष्ण को नमस्कार किया और हाथ जोड़ कर उनको बतलाया कि जरासन्ध द्वारा बन्दी बनाये जाने के कारण किस तरह अनेक राजा कष्ट भोग रहे हैं।
 
श्लोक 24:  जिन बीस हजार राजाओं ने जरासन्ध की दिग्विजय के समय पूर्ण अधीनता स्वीकार नहीं की थी, वे उसके द्वारा बलपूर्वक गिरिव्रज नामक किले में बन्दी बना लिये गये थे।
 
श्लोक 25:  [दूत के द्वारा दिये गये वृत्तान्त के अनुसार] राजाओं ने कहा : हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे अप्रमेय आत्मा, हे शरणागतों के भय के विनाशक, हम पृथक् पृथक् मत रखने के बावजूद संसार से भयभीत होकर आपके पास शरण लेने आये हैं।
 
श्लोक 26:  इस जगत में लोग सदैव पापकर्मों में लगे रहते हैं और इस तरह वे अपने असली कर्तव्य के विषय में, जो आपके आदेशानुसार आपकी पूजा करना है, विभ्रमित रहते हैं। इस कार्य से सचमुच ही उन्हें सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। हम सर्वशक्तिमान भगवान् को नमस्कार करते हैं, जो काल रूप में प्रकट होते हैं और इस जगत में दीर्घायु की प्रबल आशा को सहसा छिन्न कर देते हैं।
 
श्लोक 27:  आप विश्व के अधिष्ठाता प्रभु हैं और आप इस जगत में सन्तों की रक्षा करने तथा दुष्टों का दमन करने के लिए अपनी निजी शक्ति के साथ अवतरित हुए हैं। हे प्रभु, हम यह समझ नहीं पाते कि कोई आपके नियम का उल्लंघन करने पर भी अपने कर्म के फलों को कैसे भोग सकता है?
 
श्लोक 28:  हे प्रभु, इस शवतुल्य शरीर से, जो कि सदैव भय से ओतप्रोत रहता है, हम राजा लोग सुख के बोझ को स्वप्न की तरह वहन करते हैं। इस तरह हमने असली आत्म-सुख को त्याग दिया है, जो आपकी निस्वार्थ सेवा करने से प्राप्त होता है। इतने अधिक अभागे होने से हम आपकी माया के पाश के अन्तर्गत कष्ट भोग रहे हैं।
 
श्लोक 29:  इसलिए आप हम बन्दियों को कर्म के बन्धनों से, जो कि मगध के राजा के रूप में प्रकट हुए हैं, मुक्त कीजिये, क्योंकि आपके चरण उन लोगों के शोक को हरने वाले हैं, जो उनकी शरण में जाते हैं। दस हजार उन्मत्त हाथियों के पराक्रम को वश में करके अकेले उसने हम सबों को अपने घर में उसी तरह बन्दी कर रखा है, जिस तरह कोई सिंह भेड़ों को पकड़ लेता है।
 
श्लोक 30:  हे चक्रधारी, आपकी शक्ति अथाह है और इस तरह आपने जरासन्ध को युद्ध में सत्रह बार कुचला है। किन्तु मानवीय कामकाज में लीन होने से आपने उसे आप को पराजित करने का एक बार अवसर दिया है। अब वह गर्व से इस कदर फूला हुआ है कि आपकी जनता रूप हम सबों को, सताने का दुस्साहस कर रहा है। हे अजित, आप इस स्थिति को सुधारें।
 
श्लोक 31:  दूत ने आगे कहा : यह जरासन्ध के द्वारा बन्दी बनाये गये राजाओं का सन्देश है। वे सभी आपके दर्शनों के लिए लालायित हैं, क्योंकि उन्होंने अपने को आपके चरणों में समर्पित कर दिया है। कृपा करके इन बेचारों को सौभाग्य प्रदान करें।
 
श्लोक 32:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब राजाओं का दूत इस तरह बोल चुका, तो देवर्षि नारद सहसा प्रकट हुए। सिर पर सुनहरे रंग की जटा धारण किये परम तेजस्वी ऋषि प्रकाशमान सूर्य की तरह लग रहे थे।
 
श्लोक 33:  भगवान् कृष्ण जो ब्रह्मा तथा शिव जैसे लोकेश्वरों के भी पूज्य स्वामी हैं फिर भी ज्योंही उन्होंने नारदमुनि को आते देखा, तो वे अपने मंत्रियों तथा सचिवों समेत महर्षि का स्वागत करने तथा अपना सिर झुकाकर उन्हें सादर नमस्कार करने के लिए सहर्ष खड़े हो गये।
 
श्लोक 34:  जब नारद, उन्हें निवेदित किया गया आसन ग्रहण कर चुके, तो भगवान् ने शास्त्रीय विधियों से मुनि का स्वागत किया और सम्मानपूर्वक तुष्ट करते हुए उनसे निम्नलिखित सत्यनिष्ठ तथा मधुर शब्द कहे।
 
श्लोक 35:  [भगवान् कृष्ण ने कहा] : यह निश्चित है कि आज तीनों लोकों ने समस्त भय से मुक्ति प्राप्त कर ली है, क्योंकि यह आप जैसे सारे लोकों में स्वच्छन्द विचरण करने वाले महापुरुष का प्रताप है।
 
श्लोक 36:  ईश्वर की सृष्टि के भीतर ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो आपको ज्ञात न हो। अतएव कृपा करके हमें बतलायें कि पाण्डव क्या करना चाहते हैं?
 
श्लोक 37:  श्री नारद ने कहा : हे सर्वशक्तिमान, मैं आपकी माया की दुर्लंघ्य शक्ति को, जिससे ब्रह्माण्ड के स्रष्टा ब्रह्मा तक को आप मोहित कर लेते हैं, कई बार देख चुका हूँ। हे भूमन्, इसमें मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं लगता कि आप जीवों के बीच विचरण करते हुए अपने को अपनी ही शक्तियों से छिपा लेते हैं, जिस तरह अग्नि अपने ही प्रकाश को धुएँ से ढक लेती है।
 
श्लोक 38:  भला आपके उद्देश्य को सही सही कौन समझ सकता है? अपनी भौतिक शक्ति से आप इस सृष्टि का विस्तार करते हैं और फिर इसे अपने में लीन कर लेते हैं, जिससे प्रतीत होता है कि इसका वास्तविक अस्तित्व है। आपको नमस्कार है, जिनकी दिव्य स्थिति अचिन्त्य है।
 
श्लोक 39:  जन्म तथा मृत्यु के चक्र में फँसा जीव यह नहीं जानता कि भौतिक शरीर से, जिससे उसे इतना कष्ट मिलता है, किस प्रकार छुटकारा पाया जाये। किन्तु हे परमेश्वर, आप विविध स्वरूपों में इस जगत में अवतरित होते हैं और अपनी लीलाएँ करके अपने यश की प्रज्ज्वलित मशाल से जीव के मार्ग को आलोकित कर देते हैं। इसलिए मैं आपकी शरण में जाता हूँ।
 
श्लोक 40:  तो भी, मनुष्य का अभिनय कर रहे हे परम सत्य, मैं आपको बतलाऊँगा कि आपके बुआ के पुत्र युधिष्ठिर महाराज क्या करना चाहते हैं।
 
श्लोक 41:  राजा युधिष्ठिर एकछत्र सत्ता की इच्छा से राजसूय नामक महानतम यज्ञ द्वारा आपकी पूजा करना चाहते हैं। कृपा करके उनके इस प्रयास के लिए आशीर्वाद प्रदान करें।
 
श्लोक 42:  हे प्रभु, आपको देखने के इच्छुक सारे श्रेष्ठ देवता तथा यशस्वी राजा उस श्रेष्ठ यज्ञ में आयेंगे।
 
श्लोक 43:  हे प्रभु, आपके यश का श्रवण तथा कीर्तन करने से तथा ब्रह्मरूप आपका ध्यान करने से जाति से निकाले गये (अन्त्यज) लोग भी शुद्ध हो जाते हैं। तो फिर उनके विषय में क्या कहा जाय जो आपको देखते हैं और आपका स्पर्श करते हैं?
 
श्लोक 44:  हे प्रभु, आप सभी मंगलों के प्रतीक हैं। आपका दिव्य नाम तथा यश ब्रह्माण्ड के उच्चतर, मध्य तथा अधो लोक सहित समस्त लोकों के ऊपर छत्र के समान फैला हुआ है। आपके चरणकमलों को प्रक्षालित करने वाला दिव्य जल उच्चतर लोकों में मन्दाकिनी नदी के नाम से, अधो लोक में भोगवती के नाम से और इस पृथ्वी लोक में गंगा के नाम से विख्यात है। यह पवित्र दिव्य जल सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होता है और जहाँ भी जाता है, उसे पवित्र कर देता है।
 
श्लोक 45:  शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब जरासन्ध को हराने की इच्छा से भगवान् के पक्षधर यादवों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया, तो भगवान् केशव अपने अनुचर उद्धव की ओर मुड़े और हँसते हुए उत्तम शब्दों में उनसे बोले।
 
श्लोक 46:  भगवान् ने कहा : निस्सन्देह तुम हमारे उत्तम नेत्र तथा घनिष्ठ मित्र हो, क्योंकि विविध प्रकार की सलाहों के आपेक्षिक मूल्य को पूर्णत: जानते हो। इसलिए तुम हमसे कहो कि इस स्थिति में हमें क्या करना चाहिए। हमें तुम्हारे निर्णय पर विश्वास है और तुम जैसा कहोगे हम वैसा ही करेंगे।
 
श्लोक 47:  [शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा] : इस तरह अपने स्वामी द्वारा अनुरोध किये जाने पर, जो कि सर्वज्ञ होते हुए भी मोहित होने का अभिनय कर रहे थे, उद्धव ने उनके इस आदेश को शिरोधार्य किया और इस प्रकार उत्तर दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥