श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 73: बन्दी-गृह से छुड़ाये गये राजाओं को कृष्ण द्वारा आशीर्वाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
मृगतृष्णां यथा बाला मन्यन्त उदकाशयम् ।
एवं वैकारिकीं मायामयुक्ता वस्तु चक्षते ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
मृग-तृष्णाम्—मृगतृष्णा; यथा—जिस तरह; बाला:—बच्चों जैसी बुद्धि वाले व्यक्ति; मन्यन्ते—विचार करते हैं; उदक—जल के; आशयम्—आगार को; एवम्—उसी तरह; वैकारिकीम्—विकारों के अधीन; मायाम्—माया को; अयुक्ता:—विवेकहीन; वस्तु—चीज जैसा; चक्षते—दिखता है ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह बालबुद्धि वाले लोग मरूस्थल में मृगतृष्णा को जलाशय मान लेते हैं, उसी तरह जो अविवेकी हैं, वे माया के विकारों को वास्तविक मान लेते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥