श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 75: दुर्योधन का मानमर्दन  » 

 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में राजसूय यज्ञ के भव्य समापन तथा राजा युधिष्ठिर के महल में राजकुमार दुर्योधन के मानमर्दन का वर्णन हुआ है। महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय...
 
श्लोक 1-2:  महाराज परीक्षित ने कहा : हे ब्राह्मण, मैंने आपसे जो कुछ सुना उसके अनुसार, एकमात्र दुर्योधन के अतिरिक्त, वहाँ एकत्रित समस्त राजा, ऋषि तथा देवतागण अजातशत्रु राजा के राजसूय यज्ञ के अद्भुत उत्सव को देख कर परम हर्षित थे। हे प्रभु, कृपा करके मुझसे कहें कि ऐसा क्यों हुआ?
 
श्लोक 3:  श्री बादरायणि ने कहा : तुम्हारे सन्त सदृश दादा के राजसूय यज्ञ में उनके प्रेम से बँधे हुए उनके पारिवारिक सदस्य उनकी ओर से विनीत सेवा-कार्य में संलग्न थे।
 
श्लोक 4-7:  भीम रसोई की देख-रेख कर रहे थे, दुर्योधन कोष की देखभाल कर रहा था और सहदेव अतिथियों के सादर स्वागत में लगे थे। नकुल सारी सामग्री जुटा रहे थे, अर्जुन गुरुजनों की सेवा में रत थे जबकि कृष्ण हर एक के पाँव पखार रहे थे। द्रौपदी भोजन परोस रही थीं और दानी कर्ण उपहार दे रहे थे। अन्य अनेक लोग यथा युयुधान, विकर्ण, हार्दिक्य, विदुर, भूरिश्रवा तथा बाह्लीक के अन्य पुत्र एवं सन्तर्दन भी उस विशाल यज्ञ में विविध कार्यों में स्वेच्छा से लगे हुए थे। हे राजश्रेष्ठ, उन्होंने महाराज युधिष्ठिर को प्रसन्न करने की अपनी उत्सुकता से ही ऐसा किया।
 
श्लोक 8:  जब सारे पुरोहित, प्रमुख प्रतिनिधि, विद्वान सन्त तथा राजा के घनिष्ठ हितैषी मधुर शब्दों, शुभ उपहारों तथा विविध भेंटों रूपी दक्षिणा से भलीभाँति सम्मानित किये जा चुके और जब चेदिराज सात्वतों के प्रभु के चरणकमलों में प्रविष्ट हो चुका, तो दैवी नदी यमुना में अवभृथ स्नान सम्पन्न किया गया।
 
श्लोक 9:  अवभृथ स्नानोत्सव के समय अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे, जिनमें मृदंग, शंख, पणव, धुन्धुरि, आनक तथा गोमुख थे।
 
श्लोक 10:  नर्तकियों ने अत्याधिक मुदित होकर नृत्य किया, गायकों ने सामूहिक रूप में गाया और वीणा, वंशी तथा मंजीरे की तेज आवाज बहुत दूर स्वर्गलोक तक पहुँच गई।
 
श्लोक 11:  तब सोने के हार पहने हुए सारे राजा यमुना नदी की ओर चल पड़े। उनके साथ रंग-बिरंगे झंडे तथा पताकाएँ थीं और उनके साथ साथ पैदल सेना एवं शाही हाथियों, रथों तथा घोड़ों पर सवार सुसज्जित सिपाही थे।
 
श्लोक 12:  जुलूस में यजमान युधिष्ठिर महाराज के पीछे पीछे चल रहीं यदुओं, सृंजयों, काम्बोजों, कुरुओं, केकयों तथा कोशलवासियों की समुञ्चित सेनाओं ने धरती को हिला दिया।
 
श्लोक 13:  सभासदों, पुरोहितों तथा अन्य उत्तम ब्राह्मणों ने जोर-जोर से वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया, जबकि देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा गन्धर्वों ने यशोगान किया और फूलों की वर्षा की।
 
श्लोक 14:  चन्दन-लेप, पुष्प-मालाओं, आभूषण तथा उत्तम वस्त्र से सज्जित सारे पुरुषों तथा स्त्रियों ने विविध द्रवों को एक-दूसरे पर मल कर तथा छिडक़ कर खूब खिलवाड़ किया।
 
श्लोक 15:  पुरुषों ने वारांगनाओं के शरीरों को बहुत सारा तेल, दही, सुगन्धित जल, हल्दी तथा कुंकुम चूर्ण से पोत दिया और पलटकर उन स्त्रियों ने पुरुषों के शरीरों में वैसी ही वस्तुएँ दे पोतीं।
 
श्लोक 16:  इस तमाशे को देखने के लिए अपने अपने रथों में सवार होकर तथा अंगरक्षकों से घिर कर राजा युधिष्ठिर की रानियाँ बाहर आ गईं, मानों आकाश में दैवी विमानों में देवताओं की पत्नियाँ प्रकट हुई हों। जब ममेरे भाइयों तथा उनके घनिष्ठ मित्रों ने रानियों पर द्रव पदार्थ छिडक़े, तो उनके मुख लजीली मुसकान से खिल उठे, जिससे उनके भव्य सौन्दर्य में वृद्धि हो गई।
 
श्लोक 17:  जब रानियों ने अपने देवरों तथा अन्य पुरुष संगियों पर पिचकारियों से पानी दे मारा, तो उनके वस्त्र भीग गये, जिससे उनकी बाँहें, स्तन, जाँघें तथा कमर झलकने लगे। उल्लास में उनके जूड़े ढीले होने से उनमें बँधे फूल गिर गये। इन मनोहारी लीलाओं से उन्होंने उन लोगों को उत्तेजित कर दिया, जिनकी चेतना दूषित थी।
 
श्लोक 18:  गले की सुनहरी झालरों से युक्त उत्तम घोड़ों से खींचे जाने वाले अपने रथ पर आरूढ़ सम्राट अपनी पत्नियों के संग इतने भव्य लग रहे थे, मानों तेजस्वी राजसूय यज्ञ अपने विविध कृत्यों से घिरा हुआ हो।
 
श्लोक 19:  पुरोहितों ने राजा से पत्नी-संयाज तथा अवभृथ्य के अन्तिम अनुष्ठान पूर्ण कराये। तब उन्होंने राजा तथा रानी द्रौपदी से शुद्धि के लिए जल आचमन करने एवं गंगा नदी में स्नान करने के लिए कहा।
 
श्लोक 20:  देवताओं की दुन्दुभियाँ मनुष्यों की दुन्दुभियों के साथ साथ बज उठीं। देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा मनुष्यों ने फूलों की वर्षा की।
 
श्लोक 21:  तत्पश्चात् विभिन्न वर्णों तथा आश्रमों से सम्बद्ध नागरिकों ने उस स्थान पर स्नान किया, जहाँ पर स्नान करने से बड़ा से बड़ा पापी भी पापों के फल से तुरन्त मुक्त हो जाता है।
 
श्लोक 22:  इसके बाद राजा ने नये रेशमी वस्त्र धारण किये और अपने को सुन्दर आभूषणों से अलंकृत किया। तत्पश्चात् उन्होंने पुरोहितों, सभा के सदस्यों, विद्वान ब्राह्मणों तथा अन्य अतिथियों को आभूषण तथा वस्त्र भेंट करके उनका सम्मान किया।
 
श्लोक 23:  भगवान् नारायण के प्रति पूर्णतया समर्पित राजा युधिष्ठिर ने अपने सम्बन्धियों, परिवार वालों, अन्य राजाओं, अपने मित्रों, अपने शुभचिन्तकों तथा वहाँ पर उपस्थित सारे लोगों का निरन्तर सम्मान करते रहे।
 
श्लोक 24:  वहाँ पर उपस्थित सारे पुरुष देवताओं जैसे चमक रहे थे। वे रत्नजटित कुण्डलों, फूल की मालाओं, पगडिय़ों, अंगरखों, रेशमी धोतियों तथा कीमती मोतियों की मालाओं से सज्जित थे। स्त्रियों के सुन्दर मुखड़े उनसे मेल खा रहे कुण्डलों तथा केश-गुच्छों से सुशोभित हो रहे थे और वे सुनहरी करधनियाँ पहने थीं।
 
श्लोक 25-26:  तत्पश्चात्, हे राजन्, अत्यन्त सुसंस्कृत पुरोहितजन, महान् वैदिक विशेषज्ञ, जो यज्ञ-साक्षियों के रूप में सेवा कर चुके थे, विशेष रूप से आमंत्रित राजागण, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, देवता, ऋषि, पितर, भूत-प्रेत एवं मुख्य लोकपाल तथा उनके अनुयायीगण—ये सारे लोग राजा युधिष्ठिर से पूजे जाने के बाद उनकी अनुमति लेकर अपने अपने घरों के लिए प्रस्थान कर गये।
 
श्लोक 27:  वे उस राजर्षि तथा हरि-सेवक द्वारा सम्पन्न अद्भुत राजसूय यज्ञ की प्रशंसा करते अघा नहीं रहे थे, जिस तरह सामान्य व्यक्ति अमृत पीते नहीं अघाता।
 
श्लोक 28:  उस समय राजा युधिष्ठिर ने अपने अनेक मित्रों, निकट सम्बन्धियों तथा बान्धवों को जाने से रोक लिया, जिनमें कृष्ण भी थे। प्रेम के वशीभूत युधिष्ठिर ने उन्हें जाने नहीं दिया, क्योंकि उन्हें आसन्न विरह की पीड़ा अनुभव हो रही थी।
 
श्लोक 29:  हे परीक्षित, साम्ब तथा अन्य यदु-वीरों को द्वारका वापस भेज कर भगवान् राजा को प्रसन्न करने के लिए कुछ काल तक वहाँ ठहर गए।
 
श्लोक 30:  इस तरह धर्म-पुत्र राजा युधिष्ठिर भगवान् कृष्ण की कृपा से अपनी इच्छाओं के विशाल एवं दुर्लंघ्य समुद्र को भलीभाँति पार करके अपनी उत्कट महत्त्वाकांक्षा से मुक्त हो गये।
 
श्लोक 31:  एक दिन दुर्योधन राजा युधिष्ठिर के महल के ऐश्वर्य को देख कर राजसूय यज्ञ तथा यज्ञकर्ता राजा की महानता से, जिसका जीवन तथा आत्मा अच्युत भगवान् थे, अत्यधिक विचलित हुआ।
 
श्लोक 32:  उस महल में मनुष्यों, दानवों तथा देवताओं के राजाओं के समस्त संचित ऐश्वर्य जगमगा रहे थे, जो विश्व के अन्वेषक मय दानव द्वारा ले आया गया था। उस ऐश्वर्य से द्रौपदी अपने पतियों की सेवा करती थी, किन्तु कुरु-राजकुमार दुर्योधन संतप्त था, क्योंकि वह उसके प्रति अत्यधिक आकृष्ट था।
 
श्लोक 33:  भगवान् मधुपति की हजारों रानियाँ भी महल में ठहरी हुई थीं। उनके पाँव नितम्बों के भार से धीरे-धीरे गति करते थे और उनके पाँवों के पायजेब मनोहर शब्द करते थे। उनकी कटि अत्यन्त पतली थी, उनके स्तनों पर लगे कुंकुम से उनकी मोती की मालाएँ लाल-लाल हो गयी थीं। उनके हिलते कुण्डलों तथा लहराते बालों से उनके मुखों की भव्य शोभा बढ़ रही थी।
 
श्लोक 34-35:  ऐसा हुआ कि धर्म-पुत्र सम्राट युधिष्ठिर मय दानव द्वारा निर्मित सभाभवन में स्वर्ण सिंहासन पर इन्द्र के समान विराजमान थे। उनके साथ उनके परिचारक तथा परिवार वाले लोगों के अतिरिक्त उनके विशेष नेत्रस्वरूप भगवान् कृष्ण भी थे। साक्षात् ब्रह्मा के ऐश्वर्य को प्रदर्शित कर रहे राजा युधिष्ठिर राजकवियों द्वारा प्रशंसित हो रहे थे।
 
श्लोक 36:  अभिमानी दुर्योधन अपने हाथ में तलवार लिये और मुकुट तथा हार पहने क्रोध से भरा अपने भाइयों के साथ महल में गया। हे राजन्, घुसते समय उसने द्वारपालों का अपमान किया।
 
श्लोक 37:  मय दानव के जादू से निर्मित भ्रम से मोहग्रस्त होकर दुर्योधन ठोस फर्श को जल समझ बैठा, अत: उसने अपने वस्त्र का निचला सिरा ऊपर उठा लिया। अन्यत्र जल को ठोस फर्श समझ लेने से वह जल में गिर गया।
 
श्लोक 38:  हे परीक्षित, यह देख कर भीम हँस पड़े और उसी तरह स्त्रियाँ, राजा तथा अन्य लोग भी हँसे। राजा युधिष्ठिर ने उन्हें रोकना चाहा, किन्तु भगवान् कृष्ण ने अपनी सहमति प्रदर्शित की।
 
श्लोक 39:  लज्जित एवं क्रोध से जलाभुना दुर्योधन अपना मुँह नीचा किये, बिना कुछ कहे, वहाँ से निकल गया और हस्तिनापुर चला गया। उपस्थित सन्त-पुरुष जोर-जोर से कह उठे, “हाय! हाय!” और राजा युधिष्ठिर कुछ दुखी हो गये। किन्तु भगवान्, जिनकी चितवन् मात्र से दुर्योधन मोहित हो गया था, मौन बैठे रहे, क्योंकि उनकी मंशा पृथ्वी के भार को हटाने की थी।
 
श्लोक 40:  हे राजन्, अब मैं तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर दे चुका हू ँ कि दुर्योधन महान् राजसूय यज्ञ के अवसर पर क्यों असन्तुष्ट था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥