श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
स उपस्पृश्य सलिलं दंशितो धृतकार्मुक: ।
नय मां द्युमत: पार्श्वं वीरस्येत्याह सारथिम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—शुकदेव गोस्वामी ने कहा; स:—वह (प्रद्युम्न); उपस्पृश्य—छूकर; सलिलम्—जल; दंशित:—अपना कवच पहन कर; धृत—धारण करके; कार्मुक:—अपना धनुष; नय—ले चलो; माम्—मुझको; द्युमत:—द्युमान् के; पार्श्वम्— पास; वीरस्य—वीर के; इति—इस प्रकार; आह—बोला; सारथिम्—अपने रथचालक से ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जल से अपने को तरोताजा करने के बाद, अपना कवच पहन कर तथा अपना धनुष लेकर भगवान् प्रद्युम्न ने अपने सारथी से कहा, “मुझे वहीं वापस ले चलो, जहाँ वीर द्युमान् खड़ा है।”
 
तात्पर्य
 प्रद्युम्न अपनी इस त्रुटि को सुधारना चाह रहे थे कि उनके बेहोश
होने पर उनका सारथी उन्हें युद्धभूमि से हटा कर ले आया था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥