श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 13

 
श्लोक
तामापतन्तीं नभसि महोल्कामिव रंहसा ।
भासयन्तीं दिश: शौरि: सायकै: शतधाच्छिनत् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—उसको; आपतन्तीम्—उड़ते हुए; नभसि—आकाश में; महा—महान्; उल्काम्—टूटता तारा; इव—सदृश; रंहसा—तेजी से; भासयन्तीम्—प्रकाश करते हुए; दिश:—दिशाओं को; शौरि:—भगवान् कृष्ण ने; सायकै:—बाणों से; शतधा—सैकड़ों खण्डों में; अच्छिनत्—काट दिया ।.
 
अनुवाद
 
 शाल्व द्वारा फेंके गये भाले ने सारे आकाश को अत्यन्त तेजवान् उल्का तारे की तरह प्रकाशित कर दिया, किन्तु भगवान् शौरि ने अपने बाणों से इस महान् अस्त्र को सैकड़ों खण्डों में छिन्न-भिन्न कर डाला।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥