श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 27

 
श्लोक
एवं निर्भर्त्स्य मायावी खड्‍गेनानकदुन्दुभे: ।
उत्कृत्य शिर आदाय खस्थं सौभं समाविशत् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; निर्भर्त्स्य—मजाक उड़ाते हुए; माया-वी—जादूगर; खड्गेन—अपनी तलवार से; आनकदुन्दुभे:—श्री वसुदेव का; उत्कृत्य—काट कर; शिर:—सिर; आदाय—लेकर; ख—आकाश में; स्थम्—स्थित; सौभम्—सौभ में; समाविशत्—घुस गया ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार भगवान् की हँसी उड़ा कर जादूगर शाल्व अपनी तलवार से वसुदेव का सिर काटता हुआ प्रतीत हुआ। वह उस सिर को अपने साथ लेकर आकाश में मँडरा रहे सौभ यान में घुस गया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥