श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 28

 
श्लोक
ततो मुहूर्तं प्रकृतावुपप्लुत:
स्वबोध आस्ते स्वजनानुषङ्गत: ।
महानुभावस्तदबुध्यदासुरीं
मायां स शाल्वप्रसृतां मयोदिताम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तब; मुहूर्तम्—एक क्षण के लिए; प्रकृतौ—सामान्य (मानव) स्वभाव में; उपप्लुत:—लीन; स्व-बोध:—(यद्यपि) पूर्णतया आत्मबोध से युक्त; आस्ते—रहा; स्व-जन—अपने प्रियजनों के लिए; अनुषङ्गत:—स्नेह के कारण; महा-अनुभाव:— अनुभूति की महान् शक्ति का स्वामी; तत्—वह; अबुध्यत्—पहचान लिया; आसुरीम्—असुरों से सम्बद्ध; मायाम्—मोहक जादू; स:—वह; शाल्व—शाल्व द्वारा; प्रसृताम्—काम में लाई हुई; मय—मय दानवद्वारा; उदिताम्—विकसित ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण स्वभाव से ही ज्ञान से परिपूर्ण हैं और उनमें असीम अनुभूति की शक्ति है। तो भी प्रियजनों के प्रति महान् स्नेहवश एक क्षण के लिए वे सामान्य प्राणी की मुद्रा में लीन हो गये। लेकिन उन्हें तुरन्त ही स्मरण हो आया कि यह तो मय दानव द्वारा सृजित आसुरी माया है, जिसे शाल्व काम में ला रहा है।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥