श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 29

 
श्लोक
न तत्र दूतं न पितु: कलेवरं
प्रबुद्ध आजौ समपश्यदच्युत: ।
स्वाप्नं यथा चाम्बरचारिणं रिपुं
सौभस्थमालोक्य निहन्तुमुद्यत: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; तत्र—वहाँ; दूतम्—सन्देशवाहक; न—न तो; पितु:—पिता का; कलेवरम्—शरीर; प्रबुद्ध:—सतर्क; आजौ— युद्धभूमि में; समपश्यत्—देखा; अच्युत:—भगवान् कृष्ण ने; स्वाप्नम्—स्वप्न में; यथा—जिस तरह; च—तथा; अम्बर— आकाश में; चारिणम्—विचरण करते हुए; रिपुम्—शत्रु (शाल्व) को; सौभ-स्थम्—सौभ यान में बैठा हुआ; आलोक्य— देखकर; निहन्तुम्—मारने के लिए; उद्यत:—तैयार ।.
 
अनुवाद
 
 अब असली परिस्थिति के प्रति सतर्क भगवान् अच्युत ने अपने समक्ष युद्धभूमि में न तो दूत को देखा न अपने पिता के शरीर को। ऐसा लग रहा था, मानो वे स्वप्न से जागे हों। तब अपने शत्रु को अपने ऊपर सौभ-यान में उड़ता देखकर भगवान् ने उसे मार डालने की ठानी।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥