श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 31

 
श्लोक
क्व‍ शोकमोहौ स्‍नेहो वा भयं वा येऽज्ञसम्भवा: ।
क्व‍ चाखण्डितविज्ञानज्ञानैश्वर्यस्त्वखण्डित: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
क्व—कहाँ; शोक—शोक; मोहौ—तथा मोह; स्नेह:—भौतिक स्नेह; वा—अथवा; भयम्—भय; वा—अथवा; ये—जो; अज्ञा—अज्ञानवश; सम्भवा:—उत्पन्न; क्व च—और कहाँ, दूसरी ओर; अखण्डित—अनन्त; विज्ञान—जिनकी अनुभूति; ज्ञान—ज्ञान; ऐश्वर्य:—तथा शक्ति; तु—लेकिन; अखण्डित:—अनन्त भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 भला शोक, मोह, स्नेह या भय, जो कि अज्ञानजनित हैं, किस तरह से अनन्त भगवान् को प्रभावित कर सकते हैं, जिनकी अनुभूति, ज्ञान तथा शक्ति—सारे के सारे भगवान् की तरह ही अनन्त हैं?
 
तात्पर्य
 श्रील प्रभुपाद लिखते हैं, “शोक, संताप तथा मोह तो बद्धजीवों के लक्षण हैं, किन्तु भला ऐसी बातें परम पुरुष को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं, जो ज्ञान, शक्ति एवं समस्त ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं? वास्तव में, यह बिल्कुल सम्भव नहीं है कि भगवान् कृष्ण शाल्व के योगमय जादूगरी से गुमराह हो गये हों। वे तो मनुष्य लीला कर रहे थे।”
भागवत के सारे महान् टीकाकार इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि शोक, मोह, आसक्ति तथा भय—जो कि जीव के अज्ञान से उत्पन्न हैं, कभी भी भगवान् की दिव्य लीलाओं में उपस्थित नहीं रह सकते। श्रील रूप गोस्वामी ने इस बात को समझाने के लिए कृष्ण की लीलाओं से अनेक उदाहरण दिये हैं। उदाहरणार्थ, जब ग्वालबाल अघासुर के मुँह में चले गये थे, तो कृष्ण को ऊपरी आश्चर्य हुआ था। इसी तरह जब ब्रह्माजी कृष्ण के ग्वालमित्रों तथा बछड़ों को ले गये थे, तो भगवान् पहले तो उन सबकी खोज करते रहे, मानो वे जानते ही न हों कि वे सब कहाँ हैं? इस तरह भगवान् सामान्य मनुष्य की भूमिका अदा करते हैं, ताकि वे अपने भक्तों के साथ दिव्य लीलाओं का आस्वादन कर सकें। मनुष्य को चाहिए कि कभी भी वह भगवान् को सामान्य व्यक्ति न माने, जैसाकि शुकदेव गोस्वामी इस श्लोक में तथा इसके आगे के श्लोकों में बतलाते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥