श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 32

 
श्लोक
यत्पादसेवोर्जितयात्मविद्यया
हिन्वन्त्यनाद्यात्मविपर्ययग्रहम् ।
लभन्त आत्मीयमनन्तमैश्वरं
कुतो नु मोह: परमस्य सद्गते: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसके; पाद—पैरों की; सेवा—सेवा करने से; ऊर्जितया—सशक्त बना हुआ; आत्म-विद्यया—आत्म-साक्षात्कार द्वारा; हिन्वन्ति—दूर कर देते हैं; अनादि—जिसका आदि न हो; आत्म—आत्मा की; विपर्यय-ग्रहम्—गलत पहचान; लभन्ते—प्राप्त करते हैं; आत्मीयम्—उनके साथ निजी सम्बन्ध में; अनन्तम्—नित्य; ऐश्वरम्—कीर्ति; कुत:—कैसे; नु—निस्सन्देह; मोह:— मोह; परमस्य—ब्रह्म के; सत्—सन्त-भक्तों का; गते:—गन्तव्य ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के भक्तगण भगवान् के चरणों पर की गई सेवा से प्रबलित आत्म-साक्षात्कार के कारण देहात्मबुद्धि को दूर कर देते हैं, जो अनन्त काल से आत्मा को मोहग्रस्त करती रही है। इस तरह वे उनकी निजी संगति में नित्य कीर्ति प्राप्त करते हैं। तब भला वे परम सत्य, जो कि समस्त विशुद्ध सन्तों के गन्तव्य हैं, मोह के वशीभूत कैसे हो सकते हैं?
 
तात्पर्य
 उपवास करने से शरीर कमजोर हो जाता है और मनुष्य सोचता है कि मैं क्षीण हो गया हूँ। इसी तरह कभी कभी बद्धजीव सोचता है कि मैं सुखी हूँ या दुखी हूँ—ये देहात्मबुद्धि पर आधारित
विचार हैं। किन्तु भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की सेवा करके ही भक्तगण देहात्मबुद्धि से मुक्त हो जाते हैं। तो फिर भगवान् को ऐसा मोह किसी भी समय कैसे प्रभावित कर सकता है?
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥