श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 33

 
श्लोक
तं शस्‍त्रपूगै: प्रहरन्तमोजसा
शाल्वं शरै: शौरिरमोघविक्रम: ।
विद्ध्वाच्छिनद् वर्म धनु: शिरोमणिं
सौभं च शत्रोर्गदया रुरोज ह ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस; शस्त्र—हथियारों की; पूगै:—झड़ी से; प्रहरन्तम्—आक्रमण करते हुए; ओजसा—बड़े ही बल से; शाल्वम्—शाल्व को; शरै:—बाणों से; शौरि:—कृष्ण ने; अमोघ—अचूक; विक्रम:—जिसका पराक्रम; विद्ध्वा—बेध कर; अच्छिनत्—उसने तोड़ दिया; वर्म—कवच; धनु:—धनुष; शिर:—शिर के; मणिम्—मणि को; सौभम्—सौभ-यान को; च—तथा; शत्रो:— अपने शत्रु के; गदया—अपनी गदा से; रुरोज—तोड़ दिया; ह—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 जब शाल्व बड़े वेग से उन पर अस्त्रों की झड़ी लगाये हुए था, तो अमोघ पराक्रम वाले भगवान् कृष्ण ने शाल्व पर अपने बाण छोड़े, जिससे वह घायल हो गया और उसका कवच, धनुष तथा मुकुट का मणि ध्वस्त हो गये। तब उन्होंने अपनी गदा से अपने शत्रु के सौभ-यान को छिन्न-भिन्न कर डाला।
 
तात्पर्य
 श्रील प्रभुपाद लिखते हैं, “जब शाल्व ने सोचा कि कृष्ण उसके योगिक प्रदर्शन से विमोहित हो गये हैं, तो वह प्रोत्साहित हो उठा और अधिक शक्ति तथा बल से भगवान् पर अनेकानेक बाणों की वर्षा करने लगा। किन्तु शाल्व के उत्साह की तुलना अग्नि में तेजी से गिरने वाले पतंगों से की जा सकती है। भगवान् कृष्ण ने अपार शक्ति के साथ बाण फेंक कर शाल्व को घायल कर दिया, जिससे उसके कवच, धनुष तथा रत्नजटित मुकुट टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गये। कृष्ण की गदा के प्रहार से शाल्व का अद्भुत विमान चूर-चूर होकर समुद्र में गिर गया।”
शाल्व की नगण्य योगशक्ति कृष्ण को विमोहित नहीं कर सकी। इसी तथ्य को यहाँ पर जोर देते हुए दर्शाया गया है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥