श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 35

 
श्लोक
आधावत: सगदं तस्य बाहुं
भल्ल‍ेन छित्त्वाथ रथाङ्गमद्भ‍ुतम् ।
वधाय शाल्वस्य लयार्कसन्निभं
बिभ्रद् बभौ सार्क इवोदयाचल: ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
आधावत:—उसकी ओर दौड़ता हुआ; स-गदम्—अपनी गदा लिए; तस्य—उसके; बाहुम्—बाहु को; भल्लेन—विशेष प्रकार के बाण से; छित्त्वा—काट कर; अथ—तब; रथ-अङ्गम्—अपने चक्र से; अद्भुतम्—अद्भुत; वधाय—मारने के लिए; शाल्वस्य—शाल्व के; लय—संहार के समय; अर्क—सूर्य; सन्निभम्—हूबहू; बिभ्रत्—पकड़े हुए; बभौ—चमकने लगा; स- अर्क:—सूर्य समेत; इव—मानो; उदय—सूर्योदय का; अचल:—पर्वत ।.
 
अनुवाद
 
 जब शाल्व उनकी ओर झपटा, तो भगवान् ने एक भाला छोड़ा और उसकी उस बाँह को काट लिया, जिसमें गदा पकड़ी थी। अन्त में शाल्व का वध करने का निश्चय करके भगवान् कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उठाया, जो ब्रह्माण्ड के प्रलय के समय दिखने वाले सूर्य जैसा लग रहा था। तेज से चमकते हुए भगवान् उदयाचल जैसे प्रतीत हो रहे थे, जो उदय होते सूर्य को धारण करता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥