श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 36

 
श्लोक
जहार तेनैव शिर: सकुण्डलं
किरीटयुक्तं पुरुमायिनो हरि: ।
वज्रेण वृत्रस्य यथा पुरन्दरो
बभूव हाहेति वचस्तदा नृणाम् ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
जहार—काट लिया; तेन—इससे; एव—निस्सन्देह; शिर:—सिर; स—सहित; कुण्डलम्—कुण्डल; किरीट—मुकुट; युक्तम्—पहने हुए; पुरु—विस्तृत; मायिन:—जादू-शक्ति से युक्त; हरि:—भगवान् कृष्ण ने; वज्रेण—वज्र से; वृत्रस्य—वृत्रासुर का; यथा—जिस तरह; पुरन्दर:—इन्द्र ने; बभूव—उठा; हा-हा इति—हाय हाय, हाहाकार; वच:—ध्वनियाँ; तदा—तब; नृणाम्—(शाल्व के) मनुष्यों की ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् हरि ने अपने चक्र का इस्तेमाल करते हुए उस महान् जादूगर के सिर को कुण्डलों तथा किरीट सहित विलग कर दिया, जिस तरह पुरन्दर ने वृत्रासुर के सिर काटने के लिए अपने वज्र का इस्तेमाल किया था। यह देखकर शाल्व के सारे अनुयायी “हाय हाय” कहकर चीत्कार उठे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥