श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  »  श्लोक 37

 
श्लोक
तस्मिन् निपतिते पापे सौभे च गदया हते ।
नेदुर्दुन्दुभयो राजन् दिवि देवगणेरिता: ।
सखीनामपचितिं कुर्वन्दन्तवक्रो रुषाभ्यगात् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—उसके; निपतिते—गिरने पर; पापे—पापी; सौभे—सौभ-यान में; च—तथा; गदया—गदा से; हते—विनष्ट किये जाने पर; नेदु:—बज उठीं; दुन्दुभय:—दुन्दुभियाँ; राजन्—हे राजा (परीक्षित); दिवि—आकाश में; देव-गण—देवताओं का समूह; ईरिता:—खेलते हुए; सखीनाम्—मित्रों के लिए; अपचितिम्—बदला; कुर्वन्—लेने के विचार से; दन्तवक्र:—दन्तवक्र; रूषा—क्रोध से; अभ्यगात्—आगे दौड़ा ।.
 
अनुवाद
 
 अब पापी शाल्व के मृत हो जाने तथा उसके सौभ-यान के विनष्ट हो जाने से, देवताओं द्वारा बजाई गई दुन्दुभियों से आकाश गूँज उठा। तब अपने मित्र की मृत्यु का बदला लेने की इच्छा से दन्तवक्र ने बहुत कुपित होकर भगवान् पर आक्रमण कर दिया।
 
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध के अन्तर्गत “भगवान् कृष्ण द्वारा शाल्व की बध” नामक सतहत्तरवें अध्याय के श्रील भक्तिसिद्धान्त स्वामी प्रभुपाद के विनीत सेवकों द्वारा रचित तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥