श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 77: कृष्ण द्वारा शाल्व का वध  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में इसका वर्णन है कि भगवान् कृष्ण ने किस तरह मायाजाल के स्वामी, शाल्व का अन्त करके उसके विमान, सौभ को नष्ट कर दिया।
युद्धक्षेत्र से हटाये जाने पर प्रद्युम्न अत्यधिक लज्जित था, अत: उसने अपने सारथी को आज्ञा दी कि वह पुन: द्युमान् के सामने उसके रथ को ले चले। जब प्रद्युम्न द्युमान् से लड़ रहा था, तो गद, सात्यकि तथा साम्ब जैसे यदुवीरों ने शाल्व की सेना में भगदड़ मचा दी। इस तरह यह युद्ध सत्ताइस दिन-रात चलता रहा।

जब भगवान् कृष्ण द्वारका लौटे, तो इसे उन्होंने घिरा पाया। उन्होंने तुरन्त दारुक को आज्ञा दी कि वह उन्हें युद्धक्षेत्र ले चले। सहसा शाल्व ने भगवान् को देख लिया और उसने कृष्ण के सारथी पर अपना भाला फेंका, लेकिन भगवान् ने इसको सैकड़ों टुकड़ों में खण्ड-खण्ड कर डाला और शाल्व तथा उसके सौभ-यान को अनेक बाणों से बेध डाला। शाल्व ने बदले में एक तीर छोड़ा, जो कृष्ण की बाईं भुजा में लगा। विचित्र बात यह हुई कि इस हाथ से पकड़ा हुआ उनका शार्ङ्ग धनुष गिर पड़ा। इस तरह धनुष को गिरते देखकर युद्ध देख रहे देवतागण इसे संकट का संकेत समझ कर चिल्ला पड़े, किन्तु शाल्व ने इस अवसर का उपयोग कृष्ण को अपमानित करने के लिए किया।

तब कृष्ण ने अपनी गदा से शाल्व पर प्रहार तो किया, लेकिन वह असुर रक्त वमन करता हुआ अदृश्य हो गया। एक क्षण के पश्चात् कृष्ण के समक्ष एक व्यक्ति आया और प्रणाम करने के बाद अपना परिचय देवकी माता के दूत के रूप में दिया। उस व्यक्ति ने भगवान् को जानकारी दी कि उनके पिता वसुदेव का अपहरण शाल्व ने कर लिया है। यह सुनकर भगवान् कृष्ण सामान्य व्यक्ति की भाँति शोक करते प्रतीत होने लगे। तब शाल्व वसुदेव जैसे ही एक व्यक्ति को आगे करके आता दिखा। उसने उसका सिर काटकर अपने सौभ विमान में रख लिया। किन्तु भगवान् कृष्ण शाल्व की जादूगरी की चाल समझ गये। अत: उन्होंने शाल्व को बाणों की बौछार से बेध डाला और सौभ-यान पर अपनी गदा का प्रहार करके उसे नष्ट कर दिया। शाल्व अपने विमान से उतर कर कृष्ण पर आक्रमण करने के लिए लपका, किन्तु भगवान् ने अपना सुदर्शन चक्र उठाया और शाल्व का सिर काट लिया।

शाल्व के मरते समय देवताओं ने हर्ष से आकाश में दुन्दुभियाँ बजाईं। तब उसके मित्र दन्तव्रक ने शाल्व की मृत्यु का बदला लेने का प्रण किया।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥