श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 11

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
एवं सम्प्रार्थितो विप्र: स्वचिकीर्षितमेव तत् ।
चकार नामकरणं गूढो रहसि बालयो: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; सम्प्रार्थित:—प्रार्थना किये जाने पर; विप्र:—ब्राह्मण, गर्गमुनि, ने; स्व-चिकीर्षितम् एव—जिसे वे पहले से करना चाह रहे थे और जिसके लिए वहाँ गये थे; तत्—वह; चकार— सम्पन्न किया; नाम-करणम्—नामकरण उत्सव; गूढ:—गुप्त रूप से; रहसि—एकान्त में; बालयो:—दोनों बालकों (कृष्ण तथा बलराम) का ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब नन्द महाराज ने गर्गमुनि से विशेष प्रार्थना की कि वे जो कुछ पहले से करना चाहते थे उसे करें, तो उन्होंने एकान्त स्थान में कृष्ण तथा बलराम का नामकरण संस्कार सम्पन्न किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥