श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 13

 
श्लोक
आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनू: ।
शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गत: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
आसन्—थे; वर्णा: त्रय:—तीन रंग; हि—निस्सन्देह; अस्य—तुम्हारे पुत्र कृष्ण के; गृह्णत:—स्वीकार करते हुए; अनुयुगम् तनू:—विभिन्न युगों के अनुसार दिव्य शरीर; शुक्ल:—कभी गौर (श्वेत); रक्त:—कभी लाल; तथा—और; पीत:—कभी पीला; इदानीम् कृष्णताम् गत:—सम्प्रति उन्होंने श्याम (काला) रंग धारण किया है ।.
 
अनुवाद
 
 आपका यह पुत्र कृष्ण हर युग में अवतार के रूप में प्रकट होता है। भूतकाल में उसने तीन विभिन्न रंग—गौर, लाल तथा पीला—धारण किये और अब वह श्याम (काले) रंग में उत्पन्न हुआ है [अन्य द्वापर युग में वह शुक (तोता) के रंग में (भगवान् रामचन्द्र के रूप में) उत्पन्न हुआ। अब ऐसे सारे अवतार कृष्ण में एकत्र हो गये हैं]।
 
तात्पर्य
 गर्गमुनि ने कृष्ण की स्थिति कुछ-कुछ बतलाते हुए और कुछ-कुछ छिपाते हुए संकेत किया, “आपका पुत्र महापुरुष है और वह विभिन्न युगों में अपने शरीर का रंग बदल सकता है।” गृह्णत: शब्द सूचित करता है कि कृष्ण स्वेच्छानुसार चुनाव कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं अतएव जो चाहें सो कर सकते हैं। वैदिक साहित्य में विभिन्न युगों में भगवान् द्वारा धारण किये जाने वाले रंगों की व्याख्या की गई है अतएव जब गर्गमुनि ने यह कहा कि “आपका पुत्र ये रंग धारण कर चुका है” तो अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने यह कहा, “वह भगवान् है।” कंस के अत्याचारों के कारण गर्गमुनि यह तथ्य प्रकट नहीं करना चाहते थे किन्तु परोक्ष रूप में उन्होंने नन्द महाराज को बतला दिया कि उनका पुत्र कृष्ण वास्तव में भगवान् है।
श्रील जीव गोस्वामी ने क्रमसन्दर्भ नामक पुस्तक में इस श्लोक का तात्पर्य दिया है। प्रत्येक युग में भगवान् या तो श्वेत (शुक्ल), या लाल या पीले रंग में प्रकट होते हैं किन्तु इस बार वे अपने मूल काले (श्याम) रूप में साक्षात् प्रकट हुए हैं और जैसाकि गर्गमुनि ने भविष्यवाणी की है उन्होंने नारायण की शक्ति प्रदर्शित की। चूँकि इस रूप में भगवान् पूर्णरूपेण स्वयं का प्रदर्शन करते हैं अतएव उनका नाम श्रीकृष्ण अर्थात् सर्व-आकर्षक है।

वस्तुत: कृष्ण सारे अवतारों के स्रोत हैं अतएव विभिन्न अवतारों के भिन्न भिन्न स्वरूप कृष्ण में निहित रहते हैं। जब कृष्ण अवतरित होते हैं, तो अन्य अवतारों के सारे गुण उनमें पहले से वर्तमान रहते हैं। अन्य अवतार कृष्ण के आंशिक स्वरूप होते हैं किन्तु कृष्ण स्वयं परम पुरुष के पूर्ण अवतार हैं। यह समझ लेना चाहिए कि परम पुरुष चाहे शुक्ल रूप में प्रकट हों चाहे रक्त या पीत रूप में, वे रहते वही पुरुष हैं। जब वे विभिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं, तो वे विभिन्न रंग धारण करते हैं, जिस तरह कि सूर्य प्रकाश में सात रंग होते हैं। कभी कभी ये रंग पृथक्-पृथक् प्रकट होते हैं अन्यथा सूर्य प्रकाश चमकीले प्रकाश जैसा दिखता है। कृष्ण अवतार में विभिन्न अवतार—यथा मन्वन्तर अवतार, लीला अवतार तथा दश अवतार—सम्मिलित रहते हैं। जब कृष्ण प्रकट होते हैं, तो अन्य सारे अवतार उनके साथ साथ प्रकट होते हैं। जैसाकि श्रीमद्भागवत (१.३.२६) में वर्णन आया है—

अवतार ह्यसंख्येय हरे: सत्त्वनिधेर्द्विजा:।

यथाविदासिन: कुल्या: सरस: स्यु: सहस्रश: ॥

विभिन्न अवतार सतत प्रवाहित जल की तरह लगातार प्रकट होते रहते हैं। जिस तरह प्रवाहित जल में लहरों की संख्या की गणना नहीं की जा सकती उसी तरह अवतारों की कोई सीमा नहीं है। और कृष्ण सभी अवतारों का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि वे समस्त अवतारों के स्रोत हैं। कृष्ण अंशी हैं और अन्य अंश हैं। सारे जीव जिसमें हम सभी सम्मिलित है; अंश हैं (ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:)। ये अंश विभिन्न माप के हैं। मनुष्य (जो क्षुद्र अंश हैं) तथा देवता, विष्णुतत्त्व तथा अन्य सारे जीव परमेश्वर के अंश हैं। नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् (कठ उपनिषद २.२.१३)। कृष्ण सारे जीवों का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं और जब कृष्ण विद्यमान रहते हैं, तो सारे अवतार उनमें निहित रहते हैं।

श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध में प्रत्येक युग के अवतारों का क्रमानुसार वर्णन हुआ है। भागवत का कथन है—कृते शुक्लश्चतुर्बाहु, त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ, द्वापरे भगवान् श्याम: तथा कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम्। हम देखते हैं कि कलियुग में भगवान् पीतवर्ण में गौर-सुन्दर के रूप में प्रकट हुए यद्यपि भागवत में उन्हें कृष्णवर्णम् कहा गया है। इन सब कथनों में समन्वय स्थापित करने के लिए यह समझना चाहिए कि यद्यपि कुछ युगों में कुछ रंगों का प्राधान्य रहता है किन्तु प्रत्येक युग में, जब जब कृष्ण प्रकट होते हैं, तो सारे रंग उपस्थित रहते हैं। कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम्—यद्यपि चैतन्य महाप्रभु कृष्ण या काले रंग से रहित प्रकट होते हैं किन्तु उन्हें साक्षात् कृष्ण माना जाता है। इदानीं कृष्णतां गत:। विभिन्न वर्णों में प्रकट होने वाला वही आदि कृष्ण अब प्रकट हुआ है। आसन् शब्द बतलाता है कि वे सदैव विद्यमान रहते हैं। जब भी भगवान् अपने पूर्ण स्वरूप में प्रकट होते हैं, तो वे कृष्ण-वर्ण के रहते हैं यद्यपि वे विभिन्न रंगों में प्रकट होते हैं। प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि चैतन्य महाप्रभु छन्न हैं अर्थात् वे कृष्ण होकर भी पीले रंग से आवृत रहते हैं। इसलिए गौड़ीय वैष्णव इस निष्कर्ष को मानते हैं कि यद्यपि चैतन्य महाप्रभु पीत रंग में प्रकट हुए किन्तु वे कृष्ण हैं।

कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्।

यज्ञै संकीतर्नप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस: ॥

(भागवत ११.५.३२)

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥