श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 15

 
श्लोक
बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते ।
गुणकर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जना: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
बहूनि—विविध; सन्ति—हैं; नामानि—नाम; रूपाणि—रूप; च—भी; सुतस्य—पुत्र के; ते—तुम्हारे; गुण-कर्म-अनु रूपाणि—उसके गुणों तथा कर्मों के अनुसार; तानि—उनको; अहम्—मैं; वेद—जानता हूँ; नो जना:—सामान्य व्यक्ति नहीं ।.
 
अनुवाद
 
 तुम्हारे इस पुत्र के अपने दिव्य गुणों एवं कर्मों के अनुसार विविध रूप तथा नाम हैं। ये सब मुझे ज्ञात हैं किन्तु सामान्य लोग उन्हें नहीं जानते।
 
तात्पर्य
 बहूनि—भगवान् के अनेक नाम हैं। अद्वैतम् अच्युतम् अनादिम् अनन्तरूपम् आद्यं पुराणपुरुषं नवयौवनं च। ब्रह्म-संहिता (५.३३) में कहा गया है कि भगवान् एक हैं किन्तु उनके रूप तथा नाम अनेक हैं। ऐसा नहीं है कि गर्गमुनि ने बालक का जो नाम कृष्ण रखा वही उनका एकमात्र नाम था। उनके अन्य नाम भी हैं। यथा—भक्तवत्सल, गिरिधारी, गोविन्द तथा गोपाल। यदि हम कृष्ण शब्द की निरुक्ति पर ध्यान दें तो न सूचित करता है कि वे जन्म तथा मृत्यु के चक्र को रोकने वाले हैं और कृष् का अर्थ है सत्तार्थ अर्थात् जगत (कृष्ण सम्पूर्ण जगत हैं)। कृष् का अर्थ “आकर्षण” तथा न का अर्थ आनन्द भी होता है। कृष्ण को मुकुन्द कहते हैं क्योंकि वे हर एक को
आध्यात्मिक, नित्य तथा आनन्दपूर्ण जीवन प्रदान करने वाले हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि जीव को जो थोड़ी-सी स्वतंत्रता मिली है उससे वह कृष्ण के कार्यक्रम को ध्वस्त करना चाहता है। यही “भौतिक रोग” है। इतने पर भी कृष्ण सारे जीवों को दिव्य आनन्द प्रदान करने के लिए इच्छुक रहते हैं फलत: वे विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। इसीलिए वे कृष्ण कहलाते हैं। चूँकि गर्गमुनि ज्योतिषाचार्य थे अतएव वे वह सब जानते थे, जो अन्य लोग नहीं जानते थे। फिर भी कृष्ण के इतने नाम हैं कि गर्गमुनि भी उन सबों को नहीं जानते थे। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि कृष्ण के दिव्य कार्यकलापों के अनुसार उनके अनेक नाम तथा रूप हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥