श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 19

 
श्लोक
तस्मान्नन्दात्मजोऽयं ते नारायणसमो गुणै: ।
श्रिया कीर्त्यानुभावेन गोपायस्व समाहित: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—इसलिए; नन्द—हे नन्द महाराज; आत्मज:—आपका पुत्र; अयम्—यह; ते—तुम्हारा; नारायण-सम:—नारायण के सदृश (जो दिव्य गुण वाला है); गुणै:—गुणों से; श्रिया—ऐश्वर्य से; कीर्त्या—अपने नाम और यश से; अनुभावेन—तथा अपने प्रभाव से; गोपायस्व—इस बालक का पालन करो; समाहित:—अत्यन्त ध्यानपूर्वक तथा सावधानी से ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव हे नन्द महाराज, निष्कर्ष यह है कि आपका यह पुत्र नारायण के सदृश है। यह अपने दिव्य गुण, ऐश्वर्य, नाम, यश तथा प्रभाव से नारायण के ही समान है। आप इस बालक का बड़े ध्यान से और सावधानी से पालन करें।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में नारायण-सम: शब्द महत्त्वपूर्ण है। नारायण की कोई समता नहीं। वे असमौर्ध्व हैं—कोई न तो उनके समान है और न उनसे बढक़र। शास्त्र में कहा गया है— यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतै।
समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद् ध्रुवम् ॥

जो कोई नारायण की समता बड़े से बड़े देवता यहाँ तक कि शिवजी या ब्रह्माजी से भी करता है, वह पाषण्डी है। नारायण की समता कोई नहीं कर सकता। फिर भी गर्गमुनि ने सम शब्द का प्रयोग किया क्योंकि वे कृष्ण को भगवान् बतलाना चाह रहे थे, जो नन्द महाराज के पुत्र बन चुके थे। वे नन्द महाराज के मन में इस बात पर जोर देना चाहते थे कि “आपका आराध्य देव नारायण आप पर इतना प्रसन्न है कि उसने आपके लिए ऐसा पुत्र भेजा है, जो गुणों में लगभग उन्हीं के समान है। इसलिए आप उसका नाम उनसे मिलता-जुलता जैसे मुकुन्द या मधुसूदन रख सकते हैं। किन्तु सदा याद रखें कि जब भी आप कोई उत्तम कार्य करना चाहेंगे तो अनेक बाधाएँ आयेंगी। अतएव आप इस बालक का पालन तथा रक्षा बड़ी ही सावधानी से करें। यदि आप इस बालक की रक्षा सावधानी के साथ करेंगे तो जिस तरह नारायण सदैव आपकी रक्षा करता है उसी तरह यह बालक नारायण जैसा ही होगा।” गर्गमुनि ने यह भी इंगित किया कि यद्यपि यह बालक नारायण के समान ही गुणवान है, किन्तु यह रास विहारी के रूप में नारायण से भी बढक़र आनन्द भोगेगा। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है— लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानम्—उनकी सेवा अनेक गोपियाँ करेंगी जो लक्ष्मी के ही समान होंगी।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥