श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 21

 
श्लोक
कालेन व्रजताल्पेन गोकुले रामकेशवौ ।
जानुभ्यां सह पाणिभ्यां रिङ्गमाणौ विजह्रतु: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
कालेन—समय के; व्रजता—बीतने पर; अल्पेन—अल्प अवधि; गोकुले—गोकुल या व्रजधाम में; राम-केशवौ—बलराम तथा कृष्ण ने; जानुभ्याम्—घुटनों के बल; सह पाणिभ्याम्—हाथों के सहारे; रिङ्गमाणौ—रेंगते हुए; विजह्रतु:—खिलवाड़ किया ।.
 
अनुवाद
 
 कुछ समय बीतने के बाद राम तथा कृष्ण दोनों भाई अपने घुटनों तथा हाथों के बल व्रज के आँगन में रेंगने लगे और इस तरह बालपन के खेल का आनंद उठाने लगे।
 
तात्पर्य
 एक ब्राह्मण भक्त कहता है—
श्रुतिं अपरे स्मृतिं इतरे भारतम् अन्ये भजन्तु भवभीत: अहं इह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म। “भले ही अन्य लोग भवसागर से डर कर वेदों, पुराणों तथा महाभारत की पूजा करें किन्तु मैं नन्द महाराज की पूजा करूँगा जिनके आँगन में परब्रह्म रेंगते हैं।” महाभागवत को कैवल्य अर्थात् भगवान् ब्रह्मज्योति में समा जाना नरक के समान लगता है (नरकायते)। किन्तु यहाँ पर मनुष्य नन्द महाराज के आँगन में कृष्ण तथा बलराम के रेंगने का चिन्तन मात्र करके ही दिव्य आनन्द में लीन रह सकता है। जब तक कोई कृष्ण-लीला के, विशेष रूप से कृष्ण की बाल-लीलाओं के विचार में मग्न रहता है जैसाकि महाराज परीक्षित चाह रहे थे तब तक वह वास्तविक कैवल्य में लीन रहता है। इसीलिए व्यासदेव ने श्रीमद्भागवत की रचना की। लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वतसंहिताम् (भागवत १.७.६)। व्यासदेव ने नारदमुनि के आदेशानुसार श्रीमद्भागवत की रचना की जिससे कोई भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके, कृष्ण की लीलाओं का चिन्तन कर सके और सदा-सदा के लिए मुक्त हो जाय। श्रुतिं अपरे स्मृतिं इतरे भारतं अन्ये भजन्तु भवभीत: अहम् इह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परं ब्रह्म।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥