श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 24

 
श्लोक
यर्ह्यङ्गनादर्शनीयकुमारलीला-
वन्तर्व्रजे तदबला: प्रगृहीतपुच्छै: ।
वत्सैरितस्तत उभावनुकृष्यमाणौ
प्रेक्षन्त्य उज्झितगृहा जहृषुर्हसन्त्य: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
यर्हि—जब; अङ्गना-दर्शनीय—घर के भीतर की स्त्रियों के द्वारा ही दृश्य; कुमार-लीलौ—कृष्ण तथा बलराम द्वारा प्रदर्शित बाल-लीलाएँ; अन्त:-व्रजे—व्रज के भीतर, नन्द के घर में; तत्—उस समय; अबला:—सारी स्त्रियाँ; प्रगृहीत-पुच्छै:—कृष्ण तथा बलराम द्वारा गौवों की पूँछ पकडऩे पर; वत्सै:—बछड़ों द्वारा; इत: तत:—यहाँ वहाँ; उभौ—कृष्ण तथा बलराम दोनों; अनुकृष्यमाणौ—खींच जाने पर; प्रेक्षन्त्य:—ऐसी दृश्य देखती हुई; उज्झित—छोड़ा हुआ; गृहा:—घर के कामकाज; जहृषु:— अत्यन्त हर्षित हुईं; हसन्त्य:—हँसती हुई ।.
 
अनुवाद
 
 ग्वालबालाएँ नन्द महाराज के घर के भीतर राम तथा कृष्ण दोनों बालकों की लीलाएँ देखकर हर्षित होतीं। बच्चे बछड़ों की पूछों के पिछले भाग पकड़ लेते तो बछड़े उन्हें इधर-उधर घसीटते। जब स्त्रियाँ ये लीलाएँ देखतीं, तो निश्चय ही अपना कामकाज करना बन्द कर देतीं और हँसने लगतीं तथा इन घटनाओं का आनन्द लूटतीं।
 
तात्पर्य
 उत्सुकतावश रेंगते हुए कृष्ण तथा बलराम कभी कभी बछड़ों की पूँछों के सिरे पकड़ लेते। तब बछड़े यह अनुभव करके कि किसी ने उन्हें पकड़ लिया है इधर-उधर भागने लगते तब बच्चे बछड़ों के भागने से डर
कर और दृढ़ता से उन्हें पकड़े रहते। बछड़े भी यह देखकर कि बच्चे पूँछ दृढ़ता से पकड़े हैं, भयभीत हो उठते। तब स्त्रियाँ बच्चों को बचाने आ जातीं और प्रसन्न होकर हँसतीं। यही उनका मनोरंजन था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥