श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 25

 
श्लोक
श‍ृङ्‌ग्यग्निदंष्ट्र्यसिजलद्विजकण्टकेभ्य:
क्रीडापरावतिचलौ स्वसुतौ निषेद्धुम् ।
गृह्याणि कर्तुमपि यत्र न तज्जनन्यौ
शेकात आपतुरलं मनसोऽनवस्थाम् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
शृङ्गी—गाय; अग्नि—आग; दंष्ट्री—बन्दर तथा कुत्ते; असि—तलवार; जल—पानी; द्विज—पक्षी; कण्टकेभ्य:—तथा काँटों के साथ; क्रीडा-परौ अति-चलौ—दोनों बच्चे खेल में व्यस्त तथा अतीव चंचल; स्व-सुतौ—अपने दोनों पुत्रों को; निषेद्धुम्— रोकने के लिए; गृह्याणि—घर के कामकाज; कर्तुम् अपि—करके; यत्र—जब; न—नहीं; तत्-जनन्यौ—उनकी माताएँ (रोहिणी तथा यशोदा); शेकाते—समर्थ; आपतु:—प्राप्त किया; अलम्—निस्सन्देह; मनस:—मन का; अनवस्थाम्— सन्तुलन ।.
 
अनुवाद
 
 जब माता यशोदा तथा रोहिणी बच्चों को सींग वाली गायों से, आग से, पंजे तथा दाँत वाले पशुओं यथा बन्दरों, कुत्तों तथा बिल्लियों से एवं काँटों से, जमीन पर रखी तलवारों तथा अन्य हथियारों से होने वाली दुर्घटनाओं से रक्षा करने में अपने को असमर्थ पातीं तो वे सदा चिन्ताग्रस्त हो जातीं जिससे उनके घरेलू कामकाज में बाधा पहुँचती। उस समय वे भौतिक स्नेह के कष्ट नामक दिव्य भाव से सन्तुलन प्राप्त करतीं क्योंकि यह उनके मनों के भीतर से उठता था।
 
तात्पर्य
 कृष्ण की ये सारी लीलाएँ तथा माताओं द्वारा प्रदर्शित खुशियाँ दिव्य हैं, उनमें कुछ भी भौतिक नहीं है। ब्रह्म-संहिता में इन्हें आनन्दचिन्मय रस कहा गया है। आध्यात्मिक जगत में भी भौतिक जगत
की ही तरह चिंता, रोदन तथा अन्य भावनाएँ पाई जाती हैं किन्तु इनकी यथार्थता दिव्य जगत में ही होती है, जिसकी यह जगत अनुकृति ही है इसलिए माता यशोदा तथा रोहिणी को इनमें दिव्य आनन्द मिलता था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥