श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 3

 
श्लोक
सूपविष्टं कृतातिथ्यं गिरा सूनृतया मुनिम् ।
नन्दयित्वाब्रवीद् ब्रह्मन्पूर्णस्य करवाम किम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
सु-उपविष्टम्—जब गर्गमुनि ठीक से बैठ गये; कृत-आतिथ्यम्—तथा अतिथि के रूप में उनका स्वागत हो जाने पर; गिरा— शब्दों से; सूनृतया—अत्यन्त मधुर; मुनिम्—गर्गमुनि को; नन्दयित्वा—इस तरह प्रसन्न करके; अब्रवीत्—कहा; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; पूर्णस्य—सभी प्रकार से पूर्ण; करवाम किम्—मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ (कृपया आज्ञा दें) ।.
 
अनुवाद
 
 जब अतिथि रूप में गर्गमुनि का स्वागत हो चुका और वे ठीक से आसन ग्रहण कर चुके तो नन्द महाराज ने भद्र तथा विनीत शब्दों में निवेदन किया: महोदय, भक्त होने के कारण आप सभी प्रकार से परिपूर्ण हैं। फिर भी आपकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। कृपा करके आज्ञा दें कि मैं आपके लिए क्या करूँ?
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥