श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 30

 
श्लोक
हस्ताग्राह्ये रचयति विधिं पीठकोलूखलाद्यै-
श्छिद्रं ह्यन्तर्निहितवयुन: शिक्यभाण्डेषु तद्वित् ।
ध्वान्तागारे धृतमणिगणं स्वाङ्गमर्थप्रदीपं
काले गोप्यो यर्हि गृहकृत्येषु सुव्यग्रचित्ता: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
हस्त-अग्राह्ये—हाथ न पहुँचने पर; रचयति—बनाता है; विधिम्—उपाय; पीठक—पीढ़ा, लकड़ी की चौकी; उलूखल- आद्यै:—तथा ओखली इत्यादि से; छिद्रम्—छेद; हि—निस्सन्देह; अन्त:-निहित—बर्तन के भीतर की वस्तुएँ; वयुन:—ऐसे ज्ञान से; शिक्य—शिकहरा, छींका से टांग कर; भाण्डेषु—बर्तनों के भीतर; तत्-वित्—उस ज्ञान में दक्ष; ध्वान्त-आगारे—अँधेरे कमरे में; धृत-मणि-गणम्—मूल्यवान मोतियों से सजाया होने के कारण; स्व-अङ्गम्—अपने शरीर को; अर्थ-प्रदीपम्—अँधेरे में देखने के लिए आवश्यक प्रकाश में; काले—उसके बाद; गोप्य:—वृद्धा गोपियाँ; यर्हि—ज्योंही; गृह-कृत्येषु—घर के कामकाज करने में; सु-व्यग्र-चित्ता:—बुरी तरह लगी रहने से ।.
 
अनुवाद
 
 “जब दूध तथा दही की मटकी को छत से लटकते छींके में ऊँचा रख दिया जाता है और कृष्ण तथा बलराम उस छींके तक नहीं पहुँच पाते तो वे पीढ़ों को जुटाकर तथा मसाले पीसने की ओखली को उलट कर उस पर चढ़ कर उस तक पहुँच जाते हैं। बर्तन के भीतर क्या है, वे अच्छी तरह जानते हैं अत: उसमें छेद कर देते हैं। जब सयानी गोपिकाएँ कामकाज में लगी रहती हैं, तो कभी कभी कृष्ण तथा बलराम अँधेरी कोठरी में चले जाते हैं और अपने शरीर में पहने हुए मूल्यवान आभूषणों की मणियों की चमक से उस स्थान को प्रकाशित करके चोरी कर ले जाते हैं।
 
तात्पर्य
 पुराने समय में घर घर में दही तथा मक्खन रखा रहता था ताकि आवश्यकता पडऩे पर काम आ सके। किन्तु कृष्ण तथा बलराम इतने पीढ़े एक के ऊपर एक रख लेते कि बर्तनों तक पहुँच सकें और तब अपने हाथों से बर्तनों में छेद कर लेते जिससे उनके भीतर की सामग्री चू कर नीचे आये और वे उसे पी सकें। मक्खन तथा दूध चुराने
की यह दूसरी विधि थी। यदि मक्खन तथा दूध किसी अँधेरे कमरे में रखा होता तो कृष्ण और बलराम वहाँ जाते और अपने शरीरों में धारण किये गये बहुमूल्य मणियों से उस स्थान को प्रकाशित कर लेते। कहने का तात्पर्य यह कि कृष्ण तथा बलराम पड़ोस के घरों से दूध तथा मक्खन कई विधियों से चुराया करते थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥