श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 32

 
श्लोक
एकदा क्रीडमानास्ते रामाद्या गोपदारका: ।
कृष्णो मृदं भक्षितवानिति मात्रे न्यवेदयन् ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
एकदा—एक बार; क्रीडमाना:—बड़े होकर भी अपनी उम्र वाले अन्य बालकों के साथ खेलते; ते—वे; राम-आद्या:—बलराम तथा अन्य; गोप-दारका:—ग्वालों के पड़ोस में पैदा हुए अन्य बालक; कृष्ण: मृदम् भक्षितवान्—हे माता! कृष्ण ने मिट्टी खाई है; इति—इस प्रकार; मात्रे—माता यशोदा से; न्यवेदयन्—निवेदन किया ।.
 
अनुवाद
 
 एक दिन जब कृष्ण अपने छोटे साथियों के साथ बलराम तथा अन्य गोप-पुत्रों सहित खेल रहे थे तो उनके सारे साथियों ने एकत्र होकर माता यशोदा से शिकायत की कि “कृष्ण ने मिट्टी खाई है।”
 
तात्पर्य
 यहाँ पर कृष्ण की एक अन्य दिव्य क्रीड़ा है, जिसे गोपियों को प्रसन्न करने के लिए ढूँढ़ निकाला गया। पहले तो कृष्ण द्वारा चोरी करने की शिकायत माता यशोदा से की गई
किन्तु उन्होंने कृष्ण को नहीं डाँटा। अब एक और प्रयास में जिससे माता यशोदा क्रोध करें और उसे डाँटें, दूसरी शिकायत ढूँढ़ निकाली गई—कि कृष्ण ने मिट्टी खाई है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥