श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 37-39

 
श्लोक
सा तत्र दद‍ृशे विश्वं जगत्स्थास्‍नु च खं दिश: ।
साद्रिद्वीपाब्धिभूगोलं सवाय्वग्नीन्दुतारकम् ॥ ३७ ॥
ज्योतिश्चक्रं जलं तेजो नभस्वान्वियदेव च ।
वैकारिकाणीन्द्रियाणि मनो मात्रा गुणास्त्रय: ॥ ३८ ॥
एतद् विचित्रं सहजीवकाल-
स्वभावकर्माशयलिङ्गभेदम् ।
सूनोस्तनौ वीक्ष्य विदारितास्ये
व्रजं सहात्मानमवाप शङ्काम्? ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
सा—माता यशोदा ने; तत्र—कृष्ण के खुले मुख के भीतर; ददृशे—देखा; विश्वम्—सारे ब्रह्माण्ड को; जगत्—चर-प्राणी; स्थास्नु—अचर, जड़ प्राणी; च—तथा; खम्—आकाश; दिश:—दिशाएँ; स-अद्रि—पर्वतों सहित; द्वीप—द्वीप; अब्धि— समुद्र; भू-गोलम्—पृथ्वी की सतह; स-वायु—बहती हवा के समेत; अग्नि—आग; इन्दु—चन्द्रमा; तारकम्—तारे; ज्योति:- चक्रम्—ग्रह नक्षत्र; जलम्—जल; तेज:—प्रकाश; नभस्वान्—अन्तरिक्ष; वियत्—आकाश; एव—भी; च—तथा; वैकारिकाणि—अहंकार के रूपांतर से बनी सृष्टि; इन्द्रियाणि—इन्द्रियाँ; मन:—मन; मात्रा:—तन्मात्रा; गुणा: त्रय:—तीनों गुण (सत्त्व, रजस् तथा तमस); एतत्—ये सारे; विचित्रम्—तरह तरह के; सह—समेत; जीव-काल—सारे जीवों की आयु; स्वभाव—स्वभाव; कर्म-आशय—कर्म तथा भौतिक भोग की इच्छा (वासना); लिङ्ग-भेदम्—इच्छानुसार शरीरों के भेद; सूनो: तनौ—अपने पुत्र के शरीर में; वीक्ष्य—देखकर; विदारित-आस्ये—खुले मुँह के भीतर; व्रजम्—व्रज-धाम को; सह- आत्मानम्—अपने समेत; अवाप—हतप्रभ रह गई; शङ्काम्—शंका तथा आश्चर्य से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 जब कृष्ण ने माता यशोदा के आदेश से अपना पूरा मुँह खोला तो उन्होंने कृष्ण के मुख के भीतर सभी चर-अचर प्राणी, बाह्य आकाश, सभी दिशाएँ, पर्वत, द्वीप, समुद्र, पृथ्वीतल, बहती हवा, अग्नि, चन्द्रमा तथा तारे देखे। उन्होंने ग्रह, जल, प्रकाश, वायु, आकाश तथा अहंकार के रूपान्तर द्वारा सृष्टि देखी। उन्होंने इन्द्रियाँ, मन, तन्मात्राएँ, तीनों गुण (सतो, रजो तथा तमो) भी देखे। उन्होंने जीवों की आयु, प्राकृतिक स्वभाव तथा कर्मफल देखे। उन्होंने इच्छाएँ और विभिन्न प्रकार के चर-अचर शरीर देखे। विराट जगत के इन विविध पक्षों के साथ ही स्वयं को तथा वृन्दावन-धाम को देखकर वे अपने पुत्र के स्वभाव से सशंकित तथा भयभीत हो उठीं।
 
तात्पर्य
 स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्वों पर स्थित सारे विराट जगत, उनकी उत्तेजना के साधन, तीनों गुण, जीव, सृष्टि, पालन, संहार तथा भगवान् की बहिरंगा शक्ति से चल रही सारी क्रियाएँ—ये सभी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द से उद्भूत हैं। सारी वस्तुएँ उनके नियंत्रण में हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता से भी (९.१०) होती है। मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते स-चराचरम्—भौतिक प्रकृति की सारी वस्तुएँ
उनके नियंत्रण में हैं। चूँकि ये सारी अभिव्यक्तियाँ गोविन्द से उद्भूत हैं अतएव वे सब की सब गोविन्द के मुख में दिख सकती थीं। आश्चर्य की बात तो यह है कि माता यशोदा गहन मातृ-स्नेह के कारण भयभीत थीं। उन्हें विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि उनके पुत्र के मुख में ऐसी वस्तुएँ दिख सकती हैं। फिर भी उन्होंने देखा और इसीलिए वे भय तथा आश्चर्य से हक्की-बक्की रह गईं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥