श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 4

 
श्लोक
महद्विचलनं नृणां गृहिणां दीनचेतसाम् ।
नि:श्रेयसाय भगवन्कल्पते नान्यथा क्‍वचित् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
महत्-विचलनम्—महापुरुषों की गति; नृणाम्—सामान्य पुरुषों के घरों में; गृहिणाम्—विशेषतया गृहस्थों की; दीन- चेतसाम्—जो परिवार के भरण में लगे रहने के कारण सरल चित्त हैं; नि:श्रेयसाय—महापुरुष को गृहस्थ के घर जाने का कारण केवल उसे लाभ पहुँचाना है; भगवन्—हे शक्तिशाली भक्त; कल्पते—इस तरह समझना चाहिए; न अन्यथा—और किसी प्रयोजन के लिए नहीं; क्वचित्—किसी भी समय ।.
 
अनुवाद
 
 हे महानुभाव, हे महान् भक्त, आप जैसे पुरुष अपने स्वार्थ के लिए नहीं अपितु दीनचित्त गृहस्थों के लिए ही स्थान-स्थान पर जाते रहते हैं। अन्यथा इस तरह जगह-जगह घूमने में उन्हें कोई रुचि नहीं रहती।
 
तात्पर्य
 नन्द महाराज ने यथार्थ बात कही है कि भक्त होने के कारण गर्गमुनि को किसी प्रकार की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसी तरह जब कृष्ण आते हैं, तो उन्हें कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वे पूर्ण, आत्माराम हैं। फिर भी वे भक्तों की रक्षा करने तथा दुष्टों का विनाश करने के लिए इस भौतिक जगत में अवतरित होते हैं (परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् )। भगवान् का यही व्रत है और भक्तों का भी यही सेवाव्रत होता है। पर-उपकार का यह कार्य जो कोई पूरा करता है, वह भगवान् कृष्ण को अत्यधिक प्रिय होता है (नच तस्मान् मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:)। इसी तरह चैतन्य महाप्रभु ने इस पर-उपकार का उपदेश दिया है विशेष रूप से भारतवासियों को— भारत-भूमिते हैल मनुष्य-जन्म यार।
जन्म सार्थक करिऽकर पर-उपकार ॥

“जिसने भारतभूमि में मनुष्य के रूप में जन्म लिया है उसे अपना जीवन सफल बनाना चाहिए और अन्यों के लाभ के लिए (पर-उपकार) कार्य करना चाहिए।” (चैतन्यचरितामृत, आदि ९.४१)। कुल मिलाकर शुद्ध वैष्णव भक्त का कर्तव्य है कि दूसरों के कल्याण के लिए कार्य करे।

नन्द महाराज समझ गये थे कि गर्गमुनि इसी काम के लिए आये हुए हैं अत: अब उनका कर्तव्य था कि वे गर्गमुनि के उपदेश के अनुसार कार्य करें। अत: उन्होंने कहा, “कृपा करके मुझे मेरा कर्तव्य बतलायें।” हर एक की, विशेष रूप से हर गृहस्थ की, ऐसी ही मनोवृत्ति होनी चाहिए। वर्णाश्रम समाज आठ विभागों में संगठित है—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास। नन्द महाराज स्वयं गृहिणाम् अर्थात् गृहस्थ का प्रतिनिधित्व करते थे। वस्तुत: ब्रह्मचारी को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती किन्तु गृही तो इन्द्रिय-तृप्ति में लगे रहते हैं। भगवद्गीता (२.४४) में कहा गया है—भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्। हर व्यक्ति इस जगत में अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए आया है, अत: जो लोग इन्द्रिय-तृप्ति में बहुत अधिक लिप्त हैं और जिन्होंने गृहस्थ आश्रम स्वीकार किया है उनकी स्थिति बड़ी गम्भीर है। चूँकि इस जगत में हर व्यक्ति इन्द्रिय-तृप्ति की खोज में लगा रहता है, अत: गृहस्थों को महत् अर्थात् महात्मा बनने का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। इसलिए नन्द महाराज ने विशेष रूप से महद्-विचलनम् शब्द का प्रयोग किया है। गर्गमुनि को नन्द महाराज के यहाँ जाने में कोई स्वार्थ न था अपितु गृहस्थ होने के कारण नन्द महाराज जीवन का असली लाभ उठाने के लिए किसी भी महात्मा से उपदेश ग्रहण करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। इस तरह वे गर्गमुनि के आदेश को पूरा करने के लिए तैयार थे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥