श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 43

 
श्लोक
इत्थं विदिततत्त्वायां गोपिकायां स ईश्वर: ।
वैष्णवीं व्यतनोन्मायां पुत्रस्‍नेहमयीं विभु: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
इत्थम्—इस तरह; विदित-तत्त्वायाम्—हर वस्तु के सत्य को दार्शनिक रूप से समझ जाने पर; गोपिकायाम्—माता यशोदा के प्रति; स:—उस, भगवान् ने; ईश्वर:—परम नियन्ता; वैष्णवीम्—विष्णु-माया या योगमाया का; व्यतनोत्—विस्तार किया; मायाम्—योगमाया की; पुत्र-स्नेह-मयीम्—अपने पुत्र-स्नेह के कारण अत्यन्त अनुरक्त; विभु:—परमेश्वर ने ।.
 
अनुवाद
 
 माता यशोदा भगवान् की कृपा से असली सत्य को समझ गईं। लेकिन अन्तरंगा शक्ति, योगमाया के प्रभाव से परम प्रभु ने उन्हें प्रेरित किया कि वे अपने पुत्र के गहन मातृ-प्रेम में लीन हो जाँय।
 
तात्पर्य
 यद्यपि माता यशोदा को समस्त जीवन-दर्शन समझ में आ गया था किन्तु दूसरे ही क्षण वे योगमाया के प्रभाव से स्नेहवश अभिभूत हो गईं। उन्होंने सोचा कि जब तक वे अपने पुत्र की देखरेख नहीं करेंगीं तब तक वह सुरक्षित कैसे रह सकता है? वे अन्यथा न सोच पाईं और अपना सारा दर्शन
भूल गईं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस विस्मृति को योगमाया का प्रभाव बतलाया है (मोहनसाधर्म्यान् मायाम् )। भौतिकतावादी व्यक्ति महामाया द्वारा मुग्ध हो जाते हैं किन्तु भक्तगण दिव्य-शक्ति की व्यवस्था के अन्तर्गत योगमाया द्वारा मुग्ध होते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥