श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 46

 
श्लोक
श्रीराजोवाच
नन्द: किमकरोद् ब्रह्मन्श्रेय एवं महोदयम् ।
यशोदा च महाभागा पपौ यस्या: स्तनं हरि: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—महाराज परीक्षित ने और आगे पूछा; नन्द:—महराज नन्द ने; किम्—क्या; अकरोत्—किया; ब्रह्मन्—हे विद्वान ब्राह्मण; श्रेय:—पुण्यकर्म यथा तपस्या; एवम्—जिस तरह उन्होंने प्रकट किया; महा-उदयम्—जिससे उन्हें सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त हुई; यशोदा—माता यशोदा; च—भी; महा-भागा—अत्यन्त भाग्यशालिनी; पपौ—पिया; यस्या:—जिसका; स्तनम्—स्तन का दूध; हरि:—भगवान् ने ।.
 
अनुवाद
 
 माता यशोदा के परम सौभाग्य को सुनकर परीक्षित महाराज ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा : हे विद्वान ब्राह्मण, भगवान् द्वारा माता यशोदा का स्तन-पान किया गया। उन्होंने तथा नन्द महाराज ने भूतकाल में कौन-से पुण्यकर्म किये जिनसे उन्हें ऐसी प्रेममयी सिद्धि प्राप्त हुई?
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (७.१६) में कहा गया है—चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन। सुकृति अर्थात् पुण्यकर्मों के बिना कोई भी व्यक्ति भगवान् की शरण में नहीं आ सकता। भगवान् के पास चार प्रकार के पुण्यात्मा पहुँचते हैं (आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च ) किन्तु यहाँ हम देखते हैं कि नन्द महाराज तथा यशोदा इन सबों से बढक़र थे। इसीलिए परीक्षित महाराज ने पूछा, “उन्होंने पूर्वजन्म में किस तरह के पुण्यकर्म किये थे जिसके कारण उन्हें ऐसी सिद्धि-अवस्था प्राप्त हो सकी?” यद्यपि नन्द महाराज तथा यशोदा को कृष्ण के माता-पिता के रूप
में स्वीकार किया गया है फिर भी माता यशोदा कृष्ण के पिता नन्द महाराज से अधिक भाग्यशालिनी थीं क्योंकि नन्द महाराज कभी कभी कृष्ण से बिछुड़ते भी हैं जबकि कृष्ण की माता यशोदा क्षण-भर के लिए भी कृष्ण से विलग नहीं हुईं। कृष्ण के शिशुकाल से बाल्यकाल तथा बाल्यकाल से युवावस्था तक माता यशोदा कृष्ण की संगति में ही रहीं। जब कृष्ण बड़े हो गये थे तब भी वे वृन्दावन जाते थे और माता यशोदा की गोद में बैठ जाया करते थे। अत: माता यशोदा के भाग्य की कोई तुलना नहीं की जा सकती। इसीलिए परीक्षित महाराज ने सहज में पूछा—यशोदा च महाभागा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥