श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 5

 
श्लोक
ज्योतिषामयनं साक्षाद् यत्तज्ज्ञानमतीन्द्रियम् ।
प्रणीतं भवता येन पुमान् वेद परावरम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
ज्योतिषाम्—ज्योतिष ज्ञान (मानव समाज में संस्कृति के अन्य पक्षों के साथ साथ ज्योतिष ज्ञान भी आवश्यक है); अयनम्— नक्षत्रों तथा ग्रहों की गतियाँ; साक्षात्—प्रत्यक्ष; यत् तत् ज्ञानम्—ऐसा ज्ञान; अति-इन्द्रियम्—सामान्य व्यक्ति की दृष्टि से परे; प्रणीतम् भवता—आपके द्वारा रचित ज्ञान का सम्यक ग्रंथ; येन—जिससे; पुमान्—कोई भी व्यक्ति; वेद—समझ सकता है; पर-अवरम्—अपने भाग्य का कारण तथा कार्य ।.
 
अनुवाद
 
 हे सन्त पुरुष, आपने ज्योतिष ज्ञान को संकलित किया है, जिससे कोई भी मनुष्य अदृश्य भूत और वर्तमान बातों को समझ सकता है। इस ज्ञान के बल पर कोई भी मनुष्य यह समझ सकता है कि पिछले जीवन में उसने क्या किया और वर्तमान जीवन पर उसका कैसा प्रभाव पड़ेगा। आप इसे जानते हैं।
 
तात्पर्य
 अब “भाग्य” की परिभाषा दी जाती है। ऐसे बुद्धिहीन व्यक्ति जो जीवन का अर्थ नहीं समझते वे पशुतुल्य हैं। पशु न तो जीवन के भूत, वर्तमान तथा भविष्य को जानते हैं न ही इसे समझ सकते हैं। किन्तु धीर मनुष्य इसे समझ सकता है। इसलिए जैसाकि भगवद्गीता (२.१३) में कहा गया है—धीरस्तत्र न मुह्यति—धीर व्यक्ति मोहित नहीं होता। सचाई तो यह है कि जीवन शाश्वत है फिर भी इस भौतिक जगत में मनुष्य को एक शरीर बदलकर दूसरा शरीर धारण करना पड़ता है। इस युग में तो मूर्ख लोग इस सचाई को भी नहीं समझ पाते। कृष्ण कहते हैं (भगवद्गीता २.१३)।
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तर प्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

“जिस तरह देहधारी आत्मा इस शरीर में निरन्तर बालपन से युवावस्था और फिर वृद्धावस्था से होकर गुजरता है उसी तरह मृत्यु के समय आत्मा दूसरे शरीर में चला जाता है। जो स्वरूपसिद्ध है, वह ऐसे परिवर्तन से मोहग्रस्त नहीं होता।” परम अधिकारी कृष्ण कहते हैं कि शरीर परिवर्तनशील है और ज्योंही शरीर बदलता है मनुष्य के सारे कार्यक्रम भी बदल जाते हैं। आज मैं एक मनुष्य हैं या कोई महान् व्यक्ति हूँ किन्तु प्रकृति के नियमों में थोड़े से भी परिवर्तन से मुझे भिन्न प्रकार का शरीर स्वीकार करना होगा। आज मैं मनुष्य हूँ किन्तु कल मैं कुत्ता बन सकता हूँ और तब इस जीवन में मैंने जो भी कार्य किये होंगे वे सब विफल हो जायेंगे। इस सचाई को विरले ही समझ पाते हैं किन्तु जो धीर है, वह इसे समझ सकता है। जो लोग इस भौतिक जगत में भौतिक भोग के लिए आये हैं उन्हें समझ लेना चाहिए कि क्योंकि उनका वर्तमान पद समाप्त होकर ही रहेगा अत: उन्हें अपने कर्म करने के प्रति सावधान रहना चाहिए। यही बात ऋषभदेव ने भी कही है। न साधु मन्ये यत आत्मनोऽयमसन्नपि क्लेशद आसं देह: (भागवत ५.५.४)। यद्यपि यह शरीर नश्वर है किन्तु जब तक हम जीवित रहते हैं तब तक कष्ट सहना ही पड़ता है। चाहे जीवन अल्प हो या दीर्घ, हर एक को भौतिक जीवन के तीन ताप सहने ही होंगे। इसलिए धीर पुरुष को ज्योतिष में रुचि लेनी चाहिए।

नन्द महाराज गर्गमुनि की उपस्थिति का लाभ उठाना चाह रहे थे क्योंकि गर्गमुनि ज्योतिष ज्ञान के प्रकाण्ड पंडित थे जिससे मनुष्य भूत, वर्तमान और भविष्य की अदृश्य घटनाएँ देख सकता है। पिता का कर्तव्य है कि वह अपनी सन्तानों की ज्योतिष-दशा जाने और उनके सुख के लिए जो भी आवश्यक हो करे। फलत: गर्गमुनि की उपस्थिति का लाभ उठाने की दृष्टि से नन्द महाराज ने सुझाव रखा कि गर्गमुनि उनके दोनों पुत्रों, कृष्ण तथा बलराम, की जन्मकुण्डली तैयार कर दें।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥