श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 8: भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन  »  श्लोक 52

 
श्लोक
कृष्णो ब्रह्मण आदेशं सत्यं कर्तुं व्रजे विभु: ।
सहरामो वसंश्चक्रे तेषां प्रीतिं स्वलीलया ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
कृष्ण:—भगवान् कृष्ण ने; ब्रह्मण:—ब्रह्माजी का; आदेशम्—आदेश; सत्यम्—सच; कर्तुम्—बनाने के लिए; व्रजे—व्रजभूमि वृन्दावन में; विभु:—परम शक्तिशाली; सह-राम:—बलराम के साथ; वसन्—निवास करते हुए; चक्रे—बढ़ाया; तेषाम्— वृन्दावनवासियों का; प्रीतिम्—आनन्द; स्व-लीलया—अपनी दिव्य लीलाओं से ।.
 
अनुवाद
 
 इस तरह ब्रह्मा के वर को सत्य करने के लिए भगवान् कृष्ण बलराम समेत व्रजभूमि वृन्दावन में रहे। उन्होंने विभिन्न बाल-लीलाएँ प्रदर्शित करते हुए नन्द तथा वृन्दावन के अन्य वासियों के दिव्य आनन्द को वर्धित किया।
 
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध के अन्तर्गत “कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन” नामक आठवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥