श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 80: द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण से ब्राह्मण सुदामा की भेंट  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
श्रीराजोवाच
भगवन् यानि चान्यानि मुकुन्दस्य महात्मन: ।
वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य श्रोतुमिच्छामि हे प्रभो ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—राजा (परीक्षित) ने कहा; भगवन्—हे प्रभु (शुकदेव गोस्वामी); यानि—जो; च—तथा; अन्यानि—अन्य लोगों के; मुकुन्दस्य—भगवान् कृष्ण का; महा-आत्मन:—परमात्मा; वीर्याणि—वीरतापूर्ण कार्य; अनन्त—असंख्य; वीर्यस्य— बहादुरी के; श्रोतुम्—सुनने के लिए; इच्छामि—इच्छा करता हूँ; हे प्रभो—हे स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 राजा परीक्षित ने कहा : हे प्रभु, हे स्वामी, मैं उन असीम शौर्य वाले भगवान् मुकुन्द द्वारा सम्पन्न अन्य शौर्यपूर्ण कार्यों के विषय में सुनना चाहता हूँ।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥