श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 80: द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण से ब्राह्मण सुदामा की भेंट  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
तमुपैहि महाभाग साधूनां च परायणम् ।
दास्यति द्रविणं भूरि सीदते ते कुटुम्बिने ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उसके; उपैहि—पास जाओ; महा-भग—हे भाग्यवान्; साधूनाम्—साधुओं के; च—तथा; पर-अयणम्—चरम शरण; दास्यति—देगा; द्रविणम्—सम्पत्ति; भूरि—प्रचुर; सीदते—कष्ट पा रहे; ते—तुम्हें; कुटुम्बिने—परिवार का पालन-पोषण कर रहे ।.
 
अनुवाद
 
 हे भाग्यवान्, आप समस्त सन्तों के असली शरण, उनके पास जाइये। वे निश्चय ही आप जैसे कष्ट भोगने वाले गृहस्थ को प्रचुर सम्पदा प्रदान करेंगे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥