श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 81: भगवान् द्वारा सुदामा ब्राह्मण को वरदान  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
क्व‍ाहं दरिद्र: पापीयान् क्व‍ कृष्ण: श्रीनिकेतन: ।
ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भित: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
क्व—कौन; अहम्—मैं हूँ; दरिद्र:—निर्धन; पापीयान्—पापी; क्व—कौन; कृष्ण:—भगवान् कृष्ण हैं; श्री-निकेतन:—समस्त ऐश्वर्य के दिव्य स्वरूप; ब्रह्म-बन्धु:—ब्राह्मण का मित्र, ब्राह्मण न कहलाने योग्य; इति—इस प्रकार; स्म—निश्चय ही; अहम्— मैं; बाहुभ्याम्—भुजाओं से; परिरम्भित:—आलिंगित ।.
 
अनुवाद
 
 मैं कौन हूँ? एक पापी, निर्धन ब्राह्मण और कृष्ण कौन हैं? भगवान्, छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण। तो भी उन्होंने अपनी दोनों भुजाओं से मेरा आलिंगन किया है।
 
तात्पर्य
 उपर्युक्त भावार्थ श्रील प्रभुपाद द्वारा प्रस्तुत चैतन्य-चरितामृत (मध्य ७.१४३) के अँग्रेजी पाठ के आधार पर किया गया है। सुदामा इतना दीन था कि वह अपनी निर्धनता को अपने ही दोष या पाप का फल मान रहा था। ऐसी मनोवृत्ति इस कहावत के अनुसार है कि दारिद्र्यदोषो गुणराशिनाशी—निर्धन होने के दोष से तमाम सद्गुण नष्ट हो जाते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥