श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 81: भगवान् द्वारा सुदामा ब्राह्मण को वरदान  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
नन्वेतदुपनीतं मे परमप्रीणनं सखे ।
तर्पयन्त्यङ्ग मां विश्वमेते पृथुकतण्डुला: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
ननु—क्या; एतत्—यह; उपनीतम्—लाया गया; मे—मेरे लिए; परम—परम; प्रीणनम्—संतोष प्रदान करते हुए; सखे—हे मित्र; तर्पयन्ति—कृपापात्र बनते हैं; अङ्ग—हे प्रिय; माम्—मुझको; विश्वम्—सारे ब्रह्माण्ड (स्वरूप में); एते—ये; पृठुक- तण्डुला:—तन्दुल के दाने ।.
 
अनुवाद
 
 “हे मित्र, क्या इसे मेरे लिए लाये हो? इससे मुझे बहुत खुशी हो रही है। निस्सन्देह तन्दुल के ये थोड़े-से दाने न केवल मुझे, अपितु सारे ब्रह्माण्ड को तुष्ट करने वाले हैं।”
 
तात्पर्य
 भगवान् श्रीकृष्ण में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं: “इस कथन से यह समझा जाता है कि प्रत्येक वस्तु के मूल स्रोत भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण सृष्टि के कारण हैं। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में पानी डालने से सम्पूर्ण वृक्ष के प्रत्येक भाग को पानी मिलता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण को अर्पण की गई वस्तु को, अथवा श्रीकृष्ण के लिए किए गये किसी भी कार्य को सभी के लिए सर्वोच्च कल्याणकारी कार्य समझना चाहिए, क्योंकि ऐसे अर्पण के लाभ को सम्पूर्ण सृष्टि में वितरित किया जाता है। श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम सभी जीवात्माओं में वितरित हो जाता है।”
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥