श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 82: वृन्दावनवासियों से कृष्ण तथा बलराम की भेंट  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक
तत्रागतांस्ते दद‍ृशु: सुहृत्सम्बन्धिनो नृपान् ।
मत्स्योशीनरकौशल्यविदर्भकुरुसृञ्जयान् ।
काम्बोजकैकयान् मद्रान् कुन्तीनानर्तकेरलान् ॥ १२ ॥
अन्यांश्चैवात्मपक्षीयान् परांश्च शतशो नृप ।
नन्दादीन्सुहृदो गोपान्गोपीश्चोत्कण्ठिताश्चिरम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—वहाँ; आगतान्—आये हुए; ते—उन्होंने (यादवों ने); ददृशु:—देखा; सुहृत्—मित्रों; सम्बन्धिन:—तथा सम्बन्धीजनों; नृपान्—राजाओं को; मत्स्य-उशीनर-कौशल्य-विदर्भ-कुरु-सृञ्जयान्—मत्स्यों, उशीनरों, कौशलों, विदर्भों, कुरुओं तथा सृञ्जयों को; काम्बोज-कैकयान्—काम्बोजों तथा कैकयों को; मद्रान्—मद्रों को; कुन्तीन्—कुन्तियों को; आनर्त-केरलान्— आनर्तों तथा केरलों को; अन्यान्—अन्यों को; च एव—भी; आत्म-पक्षीयान्—अपनी टोली वालों; परान्—विपक्षियों को; च—तथा; शतश:—सैकड़ों; नृप—हे राजा (परीक्षित); नन्द-आदीन्—नन्द महाराज इत्यादि; सुहृद:—उनके प्रिय मित्र; गोपान्—ग्वालों को; गोपी:—गोपियों को; च—तथा; उत्कण्ठिता:—चिन्तित; चिरम्—दीर्घकाल से ।.
 
अनुवाद
 
 यादवों ने देखा कि वहाँ पर आये अनेक राजा उनके पुराने मित्र तथा सम्बन्धी—मत्स्य, उशीनर, कौशल्य, विदर्भ, कुरु, सृञ्जय, काम्बोज, कैकय, मद्र, कुन्ती तथा आनर्त एवं केरल देशों के राजा थे। उन्होंने अन्य सैकड़ों राजाओं को भी देखा, जो स्वपक्षी तथा विपक्षी दोनों ही थे। इसके अतिरिक्त हे राजा परीक्षित, उन्होंने अपने प्रिय मित्रों, नन्द महाराज तथा ग्वालों और गोपियों को देखा, जो दीर्घकाल से चिन्तित होने के कारण दुखी थे।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥