श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीपरीक्षिदुवाच
ब्रह्मन् ब्रह्मण्यनिर्देश्ये निर्गुणे गुणवृत्तय: ।
कथं चरन्ति श्रुतय: साक्षात् सदसत: परे ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-परीक्षित् उवाच—श्री परीक्षित ने कहा; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण (शुकदेव); ब्रह्मणि—परब्रह्म में; अनिर्देश्ये—जिसका शब्दों में वर्णन करना कठिन हो; निर्गुणे—गुणरहित; गुण—प्रकृति के गुण; वृत्तय:—जिसका कार्यक्षेत्र; कथम्—कैसे; चरन्ति—कार्य करते हैं; श्रुतय:—वेद; साक्षात्—प्रत्यक्षत:; सत्—भौतिक वस्तु को; असत:—तथा इसके सूक्ष्म कारण; परे—उसमें, जो दिव्य है ।.
 
अनुवाद
 
 श्री परीक्षित ने कहा : हे ब्राह्मण, भला वेद उस परम सत्य का प्रत्यक्ष वर्णन कैसे कर सकते हैं, जिसे शब्दों द्वारा बतलाया नहीं जा सकता? वेद भौतिक प्रकृति के गुणों के वर्णन तक ही सीमित हैं, किन्तु ब्रह्म समस्त भौतिक स्वरूपों तथा उनके कारणों को लाँघ जाने के कारण इन गुणों से रहित है।
 
तात्पर्य
 इस अध्याय की टीका आरम्भ करने के पूर्व श्रील श्रीधर स्वामी स्तुति करते हैं— वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि।
यस्यास्ते हृदये संवित् तं नृसिंहमहंभजे ॥

“मैं नृसिंह भगवान् की पूजा करता हूँ, जिनके मुख के भीतर वाणी के महान् स्वामी निवास करते हैं, जिनके वक्षस्थल पर लक्ष्मी वास करती है और जिनके हृदय में चेतना की दैवीशक्ति निवास करती है।”

सम्प्रदाय विशुद्ध्यर्थं स्वीयनिर्बन्धयन्त्रित:।

श्रुतिस्तुतिमितव्याख्यां करिष्यामि यथामति ॥

“अपने सम्प्रदाय को विशुद्ध बनाने की इच्छा से तथा कर्तव्य से बँधा होने के कारण मैं अपनी बुद्धि के अनुसार साक्षात् वेदों की स्तुतियों के विषय में संक्षिप्त टीका करूँगा।” श्रीमद्भागवतं पूर्वै सारत: सन्निषेवितम्।

मया तु तदुपस्पृष्टम् उच्छिष्टमुपचीयते ॥

“चूँकि मेरे पूर्ववर्तियों की व्याख्या से श्रीमद्भागवत पहले ही पूर्णतया आदरित है, अतएव मैं उनके द्वारा किये गये आदर का जूठन ही संग्रह कर सकता हूँ।”

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती अपनी ओर से ईश वन्दना प्रस्तुत करते हैं—

मम रत्नवणिग्भावं रत्नान्यपरिचिन्वत:।

हसन्तु सन्तो जिह्रेमि न स्वस्वान्तविनोदकृत् ॥

“सन्त-भक्त मुझ पर रत्न का व्यापारी होने के लिए हँस सकते हैं, यद्यपि मैं बहुमूल्य रत्नों के विषय में कुछ नहीं जानता। किन्तु मुझे कोई लाज नहीं लगती, क्योंकि कम-से-कम मैं उनका मनोरंजन तो कर ही सकता हूँ।”

न मे ऽस्ति वैदुष्यपि नापि भक्ति- र्विरक्तिरक्तिर्न तथापि लौल्यात्।

सुदुर्गमादेव भवामि वेद स्तुत्यर्थचिन्तामणिराशिगृध्नु: ॥

“यद्यपि मुझ में विद्या, भक्ति या विरक्ति नहीं है, तो भी मैं उस दुर्ग से वेदों की स्तुति रूपी चिन्तामणि को ग्रहण करने के लिए ललचाया रहता हूँ, जिसमें यह रखा हुआ है।” मां नीचतायामविवेकवायु: प्रवर्तते पातयितुं बलाच्चेत्।

लिखाम्यत: स्वामिसनातनश्री- कृष्णाङ्घ्रभास्तम्भकृतावलम्ब: ॥

“यदि मेरी अविवेक रूपी वायु—मेरी निम्न स्थिति को स्वीकार करने की अक्षमता—मुझे गिरा देने के लिए धमकाती है, तो इस टीका को लिखते हुए मुझे श्रीधर स्वामी, सनातन गोस्वामी तथा भगवान् श्रीकृष्ण के चरण रूपी तेजस्वी ख भों को पकडऩा होगा।”

प्रणम्य श्रीगुरुं भूय: श्रीकृष्णं करुणार्णवम्।

लोकनाथं जगच्चक्षु: श्रीशुकं तं उपाश्रये ॥

“बारम्बार अपने आध्यात्मिक गुरु को तथा कृपा के सागर भगवान् श्रीकृष्ण को शीश झुकाकर मैं श्रीशुकदेव गोस्वामी की शरण ग्रहण करता हूँ, जो संसार के रक्षक तथा जगत भर के नेत्र हैं।” पिछले अध्याय के अन्त में शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित महाराज को बतलाया था— एवं स्व भक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान्।

उषित्वादिश्य सन्मार्गं पुनर्द्वारवतीमगात् ॥

“हे राजन्! इस तरह अपने भक्तों के भक्त भगवान् अपने दो महान् भक्तों, श्रुतदेव तथा बहुलाश्व के साथ कुछ समय तक उन्हें सिद्ध सन्तों के आचरण की शिक्षा देते हुए रहते रहे। तब भगवान् द्वारका लौट गये।” इस श्लोक के सन्मार्ग शब्द को कम-से-कम तीन प्रकार से समझा जा सकता है। पहले प्रकार में सत् का अर्थ “भगवान् का भक्त” लिया जाता है और इस तरह सन्मार्ग का अर्थ “भक्तियोग का मार्ग” होता है। दूसरे प्रकार में सत् का अर्थ “दिव्य ज्ञान की खोज करने वाला” है, अत: सन्मार्ग का अर्थ होगा “ज्ञान का दार्शनिक मार्ग” जिसका मुख्य लक्ष्य निर्विशेष ब्रह्म होता है। तीसरे प्रकार में सत् का अर्थ “वेदों की दिव्य ध्वनि” लें, तो सन्मार्ग का अर्थ होगा “वैदिक आदेशों के पालन की प्रक्रिया।” इनमें से सन्मार्ग के द्वितीय तथा तृतीय अर्थों से यह प्रश्न उठता है कि वेद किस तरह परम सत्य का वर्णन कर सकते हैं।

श्रील श्रीधर स्वामी ने इस समस्या का परम्परागत संस्कृत काव्य शास्त्र की दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण किया है। हमें मानना चाहिए कि शब्दों में तीन प्रकार की अभिव्यक्ति-शक्तियाँ होती हैं, जिन्हें शब्द वृत्तियाँ कहा जाता है। ये वे विविध प्रकार हैं, जिनसे किसी शब्द के अर्थ निकलते हैं। ये हैं—मुख्य वृत्ति, लक्षणा वृत्ति तथा गौण वृत्ति। मुख्य वृत्ति शब्द के मूल शाब्दिक अर्थ को बतलाती है—इसे अभिधा शक्ति भी कहते हैं अर्थात् मुख्यार्थ अथवा शब्दकोषार्थ। मुख्य वृत्ति के दो उपविभाग हैं रूढि तथा योग। मूल अर्थ जब परम्परागत प्रयोग पर आधारित होता है, तो वह रूढि कहलाता है, जब किसी अन्य शब्द के अर्थ से व्युत्पत्तिविषयक नियमों से अर्थ निकले तो उसे योग कहते हैं। उदाहरणार्थ, गो शब्द रूढि का उदाहरण है, क्योंकि इसके शाब्दिक अर्थ से इसका सम्बन्ध परम्परागत है। इसके विपरीत पाचक शब्द योग वृत्ति है, जो पच् धातु में क प्रत्यय जोडक़र बना है।

मुख्यवृत्ति के अतिरिक्त कोई शब्द गौण, अलंकारिक रूप में भी प्रयुक्त हो सकता है। यह प्रयोग लक्षणा कहलाता है। नियम यह है कि यदि मुख्यवृत्ति से किसी शब्द का अर्थ उस प्रसंग में लग जाता है, तो फिर अलंकारिक अर्थ ढूँढऩे की आवश्यकता नहीं रहती। मुख्यवृत्ति के द्वारा किसी शब्द के अर्थ बताने में असफल होने पर ही लक्षणा वृत्ति का सहारा लिया जाता है। काव्य शास्त्र में लक्षणा के कार्य की विवेचना मिलती है। यह है : विस्तृत संदर्भ जो शाब्दिक अर्थ के साथ सम्बन्ध रखने वाले किसी शब्द की ओर संकेत करता है। इस प्रकार गंगायां घोष: पद का शाब्दिक अर्थ होगा “गंगा में ग्वालों का गाँव” किन्तु ऐसा भाव निरर्थक होगा अत: गंगायाम् का अर्थ लक्षणा द्वारा “गंगा नदी के किनारे” निकाला जाता है, क्योंकि किनारा नदी से सम्बद्ध है। गौण वृत्ति लक्षणा का विशिष्ट प्रकार है, जिसमें अर्थ को समान भाव तक विस्तार दिया जाता है। उदाहरणार्थ, सिंहो देवदत्त: (देवदत्त सिंह है) में वीर देवदत्त को अलंकार के माध्यम से सिंह कहा गया है क्योंकि उसमें सिंह जैसे गुण हैं। इसके विपरीत सामान्य लक्षणा में, यथा गंगायाम् घोष: में स्थान का सम्बन्ध तो रहता है, समानता का नहीं।

सत्तासीवें अध्याय के इस प्रथम श्लोक में परीक्षित महाराज यह संदेह व्यक्त करते हैं कि वेदों के शब्द किस तरह शब्द वृत्ति के किसी भी मान्य प्रकार से परम सत्य के द्योतक हो सकते हैं। वे पूछते हैं कथं साक्षात् चरन्ति—वेद किस तरह रूढ मुख्यवत्ति के अनुसार ब्रह्म का वर्णन कर सकते हैं? ब्रह्म तो अनिर्देश्य है अर्थात् उनका अता-पता नहीं है। और किस तरह वेद गौण वृत्ति द्वारा ब्रह्म का वर्णन कर सकते हैं? वेद तो गुणवृत्तय: हैं अर्थात् गुणों के विवरणों से ओत-प्रोत हैं, किन्तु ब्रह्म तो निर्गुण है अर्थात् गुणों से रहित है। स्पष्ट है कि कोई भी अलंकार जो समान गुणों पर आधारित हो बिना गुणों वाली वस्तु पर लागू नहीं हो सकता। यही नहीं, परीक्षित महाराज इंगित करते हैं कि ब्रह्म तो सदसत: परम्—कार्यकारण से परे हैं। सूक्ष्म या स्थूल जगत से किसी तरह सम्बन्धित न होने से ब्रह्म न तो योग वृत्ति द्वारा न ही लक्षणा द्वारा व्यक्त किया जा सकता है, क्योंकि इन दोनों में ब्रह्म के साथ अन्य जीवों का कोई न कोई सम्बन्ध होना चाहिए।

अत: राजा परीक्षित इस दुविधा में हैं कि वेदों के शब्द किस तरह ब्रह्म का प्रत्यक्ष वर्णन कर सकते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥