श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 10

 
श्लोक
श्वेतद्वीपं गतवति त्वयि द्रष्टुं तदीश्वरम् ।
ब्रह्मवाद: सुसंवृत्त: श्रुतयो यत्र शेरते ।
तत्र हायमभूत् प्रश्न‍स्त्वं मां यमनुपृच्छसि ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
श्वेतद्वीपम्—श्वेतद्वीप में; गतवति—जाकर; त्वयि—तुम (नारद); द्रष्टुम्—देखने के लिए; तत्—इसका; ईश्वरम्—स्वामी (अनिरुद्ध); ब्रह्म—ब्रह्म विषयक; वाद:—गोष्ठी; सु—उत्साहपूर्वक; संवृत्त:—प्रारम्भ हुई; श्रुतय:—वेद; यत्र—जिसमें (अनिरुद्ध जोकि क्षीरोदकशायी विष्णु भी कहलाते हैं); शेरते—शयन करने लगे; तत्र—उसके विषय में; ह—निस्सन्देह; अयम्—यह; अभूत्—उठा; प्रश्न:—प्रश्न; त्वम्—तुम; माम्—मुझसे; यम्—जो; अनुपृच्छसि—फिर से पूछ रहे हो ।.
 
अनुवाद
 
 उस समय तुम श्वेतद्वीप में भगवान् का दर्शन करने गये हुए थे—जिनके भीतर ब्रह्माण्ड के संहार काल के समय सारे वेद विश्राम करते हैं। जनलोक में परब्रह्म के स्वभाव के विषय में ऋषियों के मध्य जीवन्त वाद-विवाद उठ खड़ा हुआ। निस्सन्देह, तब यही प्रश्न उठा था, जिसे तुम अब मुझ से पूछ रहे हो।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥