श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 11

 
श्लोक
तुल्यश्रुततप:शीलास्तुल्यस्वीयारिमध्यमा: ।
अपि चक्रु: प्रवचनमेकं शुश्रूषवोऽपरे ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
तुल्य—समान; श्रुत—वेदों से सुनने में; तप:—तथा तपस्या; शीला:—जिनके चरित्र; तुल्य—समान; स्वीय—मित्रों का; अरि—शत्रु; मध्यमा:—तथा उदासीन या निष्पक्ष; अपि—यद्यपि; चक्रु:—बनाया; प्रवचनम्—वक्ता को; एकम्—उनमें से एक; शुश्रूषव:—उत्सुक श्रोतागण; अपरे—अन्य ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि वेदाध्ययन तथा तपस्या के मामले में ये ऋषि समान रूप से योग्य थे और मित्रों, शत्रुओं तथा निष्पक्षों को समान दृष्टि से देखते थे, फिर भी उन्होंने अपने में से एक को वक्ता बनाया और शेष जन उत्सुक श्रोता बन गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥