श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 12-13

 
श्लोक
श्रीसनन्दन उवाच
स्वसृष्टमिदमापीय शयानं सह शक्तिभि: ।
तदन्ते बोधयां चक्रुस्तल्लिङ्गै: श्रुतय: परम् ॥ १२ ॥
यथा शयानं संराजं वन्दिनस्तत्पराक्रमै: ।
प्रत्यूषेऽभेत्य सुश्लोकैर्बोधयन्त्यनुजीविन: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-सनन्दन:—श्री सनन्दन (ब्रह्मा का मानस पुत्र, जिसे ऋषियों के प्रश्न का उत्तर देने के लिए चुना गया) ने; उवाच—कहा; स्व—अपने से; सृष्टम्—उत्पन्न; इदम्—यह (ब्रह्माण्ड); आपीय—समेट कर के; शयानम्—सोया हुआ; सह—साथ; शक्तिभि:—अपनी शक्तियों के; तत्—उस (प्रलयकाल) के; अन्ते—अन्त में; बोधयाम् चक्रु:—उसे जगाया; तत्—उसके; लिङ्गै:—गुणों (के वर्णन) से; श्रुतय:—वेद; परम्—ब्रह्म; यथा—जिस तरह; शयानम्—सोया हुआ; संराजम्—राजा को; वन्दिन:—उसके दरबारी कवि; तत्—उसके; पराक्रमै:—वीरतापूर्ण कार्यों (के वर्णन) से; प्रत्यूषे—प्रात:काल; अभेत्य—पास पहुँच कर; सुश्लोकै:—कवित्वमय; बोधयन्ति—जगाते हैं; अनुजीविन:—उसके सेवक ।.
 
अनुवाद
 
 श्री सनन्दन ने उत्तर दिया : जब भगवान् ने अपने द्वारा पूर्व-निर्मित ब्रह्माण्ड को समेट लिया, तो वे कुछ काल तक ऐसे लेटे रहे, मानो सोये हुए हैं और उनकी सारी शक्तियाँ उनमें सुप्त पड़ी रहीं। जब अगली सृष्टि करने का समय आया, तो साक्षात् वेदों ने उनकी महिमाओं का गायन करते हुए उन्हें जगाया, जिस तरह राजा की सेवा में लगे कविगण प्रात:काल उसके पास जाकर उसके वीरतापूर्ण कार्यों को सुनाकर, उसे जगाते हैं।
 
तात्पर्य
 सृष्टि के समय महाविष्णु की श्वास से सर्वप्रथम वेद प्रकट होते हैं और वे साकार रूप में उन्हें योगनिद्रा से जगाकर उनकी सेवा करते हैं। सनन्दन के इस कथन से यह अर्थ निकलता है कि सनक तथा अन्य ऋषियों ने उनसे वही प्रश्न पूछा था, जो नारद ने नारायण ऋषि से तथा महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से
पूछा था। सनन्दन फिर से इस प्रश्न का सन्दर्भ साक्षात् वेदों द्वारा महाविष्णु से पूछे गये प्रश्न से जोड़ते हैं। यद्यपि वेद जानते थे कि सर्वज्ञ होने के कारण भगवान् को उनकी महिमा बताने की आवश्यकता नहीं है, किन्तु उन्होंने इस अवसर का लाभ उत्साहपूर्वक उनकी प्रशंसा करने के लिए उठाया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥