श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 14

 
श्लोक
श्रीश्रुतय ऊचु:
जय जय जह्यजामजित दोषगृभीतगुणां
त्वमसि यदात्मना समवरुद्धसमस्तभग: ।
अगजगदोकसामखिलशक्त्यवबोधक ते
क्व‍‍चिदजयात्मना च चरतोऽनुचरेन्निगम: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-श्रुतय: ऊचु:—वेदों ने कहा; जयजय—आपकी जय हो, जय हो; जहि—परास्त करें; अजाम्—माया को; अजित—हे अजित; दोष—दोष उत्पन्न करने के लिए; गृभीत—धारण किये हुए; गुणाम्—पदार्थ के गुण; त्वम्—तुम; असि—हो; यत्— क्योंकि; आत्मना—अपनी मूल स्थिति मे; समवरुद्ध—पूर्ण; समस्त—समस्त; भग:—ऐश्वर्य में; अग—अचर; जगत्—तथा चर; ओकसाम्—भौतिक शरीर वालों के; अखिल—समस्त; शक्ति—शक्तियाँ; अवबोधक—हे जागृत करने वाले; ते—तुम; क्वचित्—कभी कभी; अजया—अपनी भौतिक शक्ति से; आत्मना—तथा अपनी अन्तरंगा आध्यात्मिक शक्ति से; च—भी; चरत:—व्यस्त रखते हुए; अनुचरेत्—समझ सकता है; निगम:—वेद ।.
 
अनुवाद
 
 श्रुतियों ने कहा : हे अजित, आपकी जय हो, जय हो, अपने स्वभाव से आप समस्त ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं, अतएव आप माया की शाश्वत शक्ति को परास्त करें, जो बद्धजीवों के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न करने के लिए तीनों गुणों को अपने वश में कर लेती है। चर तथा अचर देहधारियों की समस्त शक्ति को जागृत करने वाले, कभी कभी जब आप अपनी भौतिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों के साथ क्रीड़ा करते हैं, तो वेद आपको पहचान लेते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार साक्षात् वेदों की स्तुतियों के २८ श्लोक (श्लोक १४ से ४१ तक) अट्ठाइस प्रमुख श्रुतियों के मतों को प्रस्तुत करने वाले हैं। ये मुख्य उपनिषद् तथा अन्य श्रुतियाँ ब्रह्म के विविध पक्षों से सम्बद्ध हैं और इनमें से वे श्रुतियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शुद्ध अनन्य भक्ति पर बल देती हैं। उपनिषद् उसका निषेध करते हैं, जो सर्वप्रथम भगवान् से पृथक् है और तब उनके कुछ मुख्य गुणों का वर्णन करके हमारा ध्यान भगवान् की ओर आकृष्ट करते हैं।
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने इस स्तुति में सर्वप्रथम आए जय जय शब्दों की व्याख्या “कृपया अपनी सर्वोच्चता प्रकट कीजिये” के रूप में की है। जय शब्द की पुनरुक्ति आदर या हर्षवश हुई है। भगवान् पूछ सकते हैं, “मैं अपनी सर्वोच्चता किस तरह प्रकट करूँ?”

श्रुतियाँ इसका उत्तर भगवान् से यह प्रार्थना करते हुए देती हैं कि वे सारे जीवों पर कृपा करके उनके अज्ञान को नष्ट कर दें और उन्हें अपने चरणकमलों की ओर आकृष्ट करें। भगवान् कहते हैं, “लेकिन जीवों पर अज्ञान लादने वाली माया उत्तम गुणों से युक्त है (गृभीत गुणान् )। तो मैं उसका विरोध क्यों करूँ?”

वेद उत्तर देते हैं, “ठीक है, लेकिन उसने बद्धजीवों को मोहित करने के लिए तथा झूठे ही भौतिक शरीरों से अपनी पहचान करने के लिए तीनों गुणों को धारण कर रखा है। उसके तीनों गुण— सतो, रजो तथा तमोगुण—दोषयुक्त (दोष-गृभीत ) हैं, क्योंकि आप उनकी उपस्थिति में प्रकट नहीं होते।”

श्रुतियाँ भगवान् को अजित कहती हैं जिसका अर्थ है कि “केवल आप ही ऐसे हैं, जो माया द्वारा जीते नहीं जाते, जबकि ब्रह्मा जैसे अन्य लोग अपनी ही त्रुटियों द्वारा परास्त कर दिये जाते हैं।” भगवान् उत्तर देते हैं, “लेकिन तुम्हारे पास इसका कौन-सा प्रमाण है कि वह मुझे नहीं जीत पाती?”

“इसका प्रमाण इस तथ्य में निहित है कि आपने अपनी मूल स्थिति में समस्त ऐश्वर्य की सिद्धियाँ प्राप्त कर ली हैं।”

इस बात पर भगवान् को यह आपत्ति हो सकती है कि जीवों का अज्ञान नष्ट कर देने से ही वे मेरे चरणकमलों में नहीं चले आयेंगे, क्योंकि अज्ञान दूर किये जाने पर भी जीवात्मा भक्ति किये बिना भगवान् को प्राप्त नहीं कर सकता। स्वयं भगवान् का कथन है (भागवत ११.१४.२१)— भक्त्याहमेकया ग्राह्य:—केवल भक्ति द्वारा मुझे प्राप्त किया जा सकता है।

इस आपत्ति का उत्तर श्रुतियाँ देती हैं, “हे समस्त शक्तियों को जगाने वाले प्रभु! आप जीवों में बुद्धि तथा इन्द्रियाँ उत्पन्न करके उन्हें कठिन श्रम करने तथा अपने श्रम का फल भोगने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसके अतिरिक्त ज्ञान, योग तथा भक्ति के उन्नतिशील मार्गों का अनुसरण करने के लिए उनकी क्षमता को जागृत करते हुए आप उन्हें क्रमश: अपने ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् तीनों पक्षों की ओर अग्रसर होने देते हैं। जब ज्ञान, योग तथा भक्ति प्रौढ़ होते हैं, तो आप जीवों को अपने तीनों पक्षों का साक्षात्कार करने देते हैं।”

यदि भगवान् साक्षात् वेदों के इस कथन का समर्थन करने वाला प्रामाणिक साक्ष्य माँगते तो वेद विनयपूर्वक उत्तर देते, “हम स्वयं साक्ष्य हैं। कुछ अवसरों पर—जैसे कि अब, सृष्टि के समय—आप अपनी बहिरंगा शक्ति माया के साथ क्रीड़ा करते हैं, जबकि आपकी अन्तरंगा शक्ति सदैव आपके साथ रहती है। वर्तमान के ही जैसे समयों पर जब आपकी सक्रियता बाह्य रूप से प्रकट होती है कि हम वेद आपको आपकी क्रीड़ा में पहचान लेते हैं।”

इस तरह भगवान् के साथ अपने निजी संसर्ग से प्राप्त अधिकार से श्रुतियाँ कर्म, ज्ञान योग तथा भक्ति को विविध साधनों के रूप में प्रयुक्त करती हैं, जिससे बद्धजीव ब्रह्म की खोज में अपनी बुद्धि, इन्द्रियाँ, मन तथा प्राण का प्रयोग कर सकें।

कई स्थानों पर वेद ब्रह्म के दिव्य साकार गुणों की प्रशंसा करते हैं। निम्नलिखित श्लोक श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.११), गोपालतापनी उपनिषद् (उत्तर ९७) तथा ब्रह्म उपनिषद् (४.१) में आया है— एको देव: सर्वभूतेषु गूढ: सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।

कर्माध्यक्ष: सर्वभूताधिवास: साक्षी: चेता: केवलो निर्गुणश्च ॥

“एक ही भगवान् उत्पन्न की गई सारी वस्तुओं के भीतर छिपा हुआ है। वह समस्त पदार्थ में व्याप्त है और सारे जीवों के हृदयों के भीतर स्थित है। वह अन्त:वासी परमात्मा के रूप में उनकी भौतिक गतिविधियों का निरीक्षण करता है। इस तरह स्वयं निर्गुण होते हुए वह अद्वितीय साक्षी एवं चेतना देने वाला है।”

ब्रह्म के साकार गुणों का अधिक वर्णन उपनिषदों के निम्नलिखित उद्धरणों में पाया जाता है—य: सर्वज्ञ स सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तप: जो सब जानने वाला है, जिससे समस्त ज्ञान की शक्ति आती है— वह सबों में से अधिक ज्ञानी है (मुण्डक उपनिषद् १.१.९)। सर्वस्य वशी सर्वस्येशान:—वह हर एक का स्वामी तथा नियन्ता है (बृहदारण्यक उपनिषद् ४.४.२२); तथा य: पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या आन्तरो यं पृथिवी न वेद—वह जो पृथ्वी के भीतर रहता है और उसमें व्याप्त है और जिसे पृथ्वी नहीं जानती (बृहदारण्यकउपनिषद् ३.७.३)।

सृष्टि करने में भगवान् की भूमिका का उल्लेख अनेक श्रुति-कथनों में हुआ है। बृहदारण्यक उपनिषद् (१.२.४) का कथन है—सोऽकामयत बहु स्याम्—उसने इच्छा की कि मैं अनेक हो जाऊँ। सोऽकामयत (उसने इच्छा की) का यहाँ यह अर्थ है कि भगवान् का व्यक्तित्व शाश्वत हैं, क्योंकि सृष्टि के भी पूर्व ब्रह्म को इच्छा हुई और इच्छा तो व्यक्तियों का अद्वितीय लक्षण है। ऐतरेय उपनिषद् (३.११) में भी इसी तरह का कथन आया है—स ऐक्षत तत्तेजोऽसृजत—उसने देखा और उसकी शक्ति ने सृष्टि कर दी। यहाँ पर तत्तेज: शब्द भगवान् के अंशरूप महाविष्णु का द्योतक है, जो माया पर दृष्टि डालता है, जिससे भौतिक सृष्टि प्रकट होती है। अथवा तत्तेज: से भगवान् के निर्विशेष ब्रह्म स्वरूप का, उनकी सर्वव्यापक शक्ति, शाश्वत उपस्थिति का द्योतन हो सकता है। जैसाकि ब्रह्म-संहिता (५.४०) में वर्णन हुआ है—

यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि- कोटिष्वशेषवसुधादिविभूतिभिन्नम्।

तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जो महान् शक्ति से सम्पन्न हैं। उनके दिव्य स्वरूप का प्रकाशमान तेज निर्विशेष ब्रह्म है, जो परम, पूर्ण तथा अनन्त है और जो कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों में असंख्य लोकों (ग्रहों) को उनके पृथक् पृथक् ऐश्वर्यों के समेत प्रदर्शित करता है।” इस श्लोक का सार-समाहार करते हुए श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

जय जयाजित जह्यगजंगमा वृतिमजामुपनीतमृषागुणाम् ।

न हि भवन्तमृते प्रभवन्त्यामी निगमगीतगुणार्णवता तव ॥

“हे अजित! आपकी जय हो, जय हो। कृपा करके अपनी नित्य माया के प्रभाव को परास्त करें, जो समस्त चराचर प्राणियों को आच्छादित करती है और मोह के गुणों पर शासन चलाती है। आपके प्रभाव के बिना ये सारे वैदिक-मंत्र आपका गुणगान दिव्य गुणों के सागर के रूप में करने में असमर्थ रहेंगे।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥