श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 16

 
श्लोक
इति तव सूरयस्‍त्र्यधिपतेऽखिललोकमल-क्षपणकथामृताब्धिमवगाह्य तपांसि जहु: ।
किमुत पुन: स्वधामविधुताशयकालगुणा:परम भजन्ति ये पदमजस्रसुखानुभवम् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; तव—तुम्हारा; सूरय:—ज्ञानी सन्त; त्रि—तीन (लोकों के); अधिपते—हे स्वामी; अखिल—समस्त; लोक—लोकों का; मल—दूषण; क्षपण—उन्मूल करने वाले; कथा—चर्चा के; अमृत—अमृत; अब्धिम्—समुद्र में; अवगाह्य—डुबकी लगाकर; तपांसि—अपने कष्टों को; जहु:—त्याग दिया है; किम् उत—क्या कहा जा सकता है; पुन:—और भी; स्व—अपनी; धाम—शक्ति से; विधुत—दूर किया हुआ; आशय—मनों के; काल—तथा समय के; गुणा:—(अवांछित) गुण; परम—हे सर्वश्रेष्ठ; भजन्ति—पूजा करते हैं; ये—जो; पदम्—आपके असली स्वभाव को; अजस्र—निर्बाध; सुख—सुख का; अनुभवम्—अनुभव ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव हे त्रिलोकपति, बुद्धिमान लोग आपकी कथाओं के अमृतमय सागर में गहरी डुबकी लगाकर समस्त क्लेशों से छुटकारा पा लेते हैं, क्योंकि आपकी कथाएँ ब्रह्माण्ड के सारे दूषण को धो डालती हैं। तो फिर उन लोगों के बारे में क्या कहा जाय, जिन्होंने आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा अपने मनों को बुरी आदतों से और स्वयं को काल से मुक्त कर लिया है और, हे परम पुरुष, आपके असली स्वभाव की, जिसके भीतर निर्बाध आनन्द भरा है, पूजा करने में समर्थ हैं?
 
तात्पर्य
 श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार पिछले श्लोक में उन श्रुतियाँ ने जिनके ब्रह्म-विषयक वर्णन निर्विशेष लगे हों अपने असली प्रयोजन को स्पष्ट कर दिया। अब इस श्लोक में वे श्रुतियाँ जो अपना ध्यान दिव्य भगवान् पर ही केन्द्रित करती हैं और उन्हीं की दिव्य लीलाओं का वर्णन करती हैं उनकी प्रशंसा कर रही हैं।
चूँकि सारे वेद भगवान् की श्रेष्ठता सर्वकारण कारणं के रूप में घोषित करते हैं, अतएव विवेकशील व्यक्तियों को चाहिए कि उन भगवान् की पूजा करना स्वीकार करें। उनके महिमाओं रूपी समुद्र में गोता लगाकर बुद्धिमान भक्त समस्त जीवों के कष्टों को भगाने में सहायता करते हैं और भौतिक जीवन के प्रति अपनी आसक्ति को शिथिल बनाते हैं। ये प्रगतिशील भक्त धीरे धीरे सारी भौतिक आसक्तियाँ त्याग देते हैं और कर्म, ज्ञान तथा योग की कष्टप्रद तपस्या के प्रति, जो किसी समय उनकी रुचि थी, उसे समाप्त कर देते हैं।

इन भक्तों से भी परे श्रुतियाँ हैं, जो दिव्य सत्य की पारखी हैं और भगवान् के यश रूपी अमृतमय समुद्र में गोता लगाकर इसका सम्मान करती हैं। भगवान् के ये परिपक्व भक्त आशातीत सिद्धि प्राप्त करते हैं। भगवान् इनके निष्ठावान् प्रयासों से आदान-प्रदान करके इन्हें शक्ति प्रदान करते हैं कि ये उनके साकार रूप की अनुभूति कर सकें। प्रसन्नतापूर्वक भगवान् की अन्तरंगा लीलाओं तथा वातावरण का स्मरण करके ये मानसिक दूषण के अन्तिम सूक्ष्म चिह्नों से तथा रोग एवं बुढ़ापे की दुर्निवार पीड़ा के प्रति संवेदनशीलता से सर्वथा स्वत: मुक्त हो जाते हैं।

भक्ति की शुद्धि करने की शक्ति का उल्लेख करते हुए श्रुतियाँ कहती हैं तद् यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्ते एवम् एवंविधि पापं कर्म न श्लिष्यते—जिस तरह कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता उसी तरह पापपूर्ण कर्म उस पर नहीं ठहरते, जो सत्य को इस तरह से जानता है। शतपथ ब्राह्मण (१४.७.२८), तैत्तिरीय ब्राह्मण (३.१२.९.८), बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.२८) तथा बौधायन-धर्म शास्त्र (२.६.११.३०) सभी एकमत हैं कि न कर्मणा लिप्यते पापकेन—इस तरह पापपूर्ण कर्म द्वारा दूषित होने से बचा जा सकता है।

ऋग्वेद (१.१५४.१) में भगवान् की लीलाओं का उल्लेख इस प्रकार मिलता है—विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं य: पार्थिवानि विममे रजांसि—जो कोई संसार-भर के सभी धूल-कणों को गिन सकता है केवल वही भगवान् विष्णु के वीरतापूर्ण कार्यों को पूरी तरह प्रतिपादित कर सकता है। अनेक श्रुति मंत्रों में भगवद्भक्ति की प्रशंसा की गई है। यथा—एको वशी सर्वगो येऽनुभजन्ति धीरास्। तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्—वे ही एक सर्वव्यापक प्रभु तथा नियन्ता हैं, केवल वे चतुर आत्माएँ, जो उनकी पूजा करती हैं शाश्वत सुखपाती हैं, अन्य आत्माएँ नहीं।

इस प्रसंग में श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

सकलवेदगणेरितसद्गुणस्त्वम् इति सर्वमनीषिजना रता:।

त्वयि सुभद्रगुणश्रवणादिभिस्तव पदस्मरणेन गतक्लमा: ॥

“चूँकि सारे वेद आपके दिव्य गुणों का वर्णन करते हैं इसलिए सारे विचारशील व्यक्ति आपके सर्वमंगलकारी गुणों के सुनने और उनका कीर्तन करने की ओर आकर्षित होते हैं। इस तरह आपके चरणकमलों का स्मरण करके वे भौतिक दुख से मुक्त हो जाते हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥