श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 17

 
श्लोक
द‍ृतय इव श्वसन्त्यसुभृतो यदि तेऽनुविधा
महदहमादयोऽण्डमसृजन् यदनुग्रहत: ।
पुरुषविधोऽन्वयोऽत्र चरमोऽन्नमयादिषु य:
सदसत: परं त्वमथ यदेष्ववशेषमृतम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
दृतय:—धौंकनी; इव—सदृश; श्वसन्ति—श्वास लेते हैं; असु-भृत:—जीवित; यदि—यदि; ते—तुम्हारे; अनुविधा:—स्वामि- भक्त अनुयायी; महत्—सम्पूर्ण भौतिक शक्ति; अहम्—मिथ्या अहंकार; आदय:—तथा सृष्टि के अन्य तत्त्व; अण्डम्—ब्रह्माण्ड को; असृजन्—उत्पन्न किया; यत्—जिसकी; अनुग्रहत:—कृपा से; पुरुष—जीविका; विध:—विशिष्ट स्वरूपों के अनुसार; अन्वय:—जिनका प्रवेश; अत्र—इनमें से; चरम:—चरम; अन्न-मय-आदिषु—अन्नमय नामक अभिव्यक्तियों में; य:—जो; सत्- असत:—स्थूल तथा सूक्ष्म पदार्थ से; परम्—पृथक्; त्वम्—तुम; अथ—और भी आगे; यत्—जो; एषु—इनमें से; अवशेषम्— निहित; ऋतम्—वास्तविकता ।.
 
अनुवाद
 
 यदि वे आपके श्रद्धालु अनुयायी बन जाते हैं, तभी वे साँस लेते हुए वास्तव में जीवित हैं, अन्यथा उनका साँस लेना धौंकनी जैसा है। यह तो आपकी एकमात्र कृपा ही है कि महत् तत्त्व तथा मिथ्या अहंकार से प्रारम्भ होने वाले तत्त्वों ने इस ब्रह्माण्ड रूपी अंडे को जन्म दिया। अन्नमय इत्यादि स्वरूपों में आप ही चरम हैं, जो जीव के साथ भौतिक आवरणों में प्रवेश करके उसके ही जैसे स्वरूप ग्रहण करते हैं। स्थूल तथा सूक्ष्म भौतिक स्वरूपों से भिन्न, आप उन सबों में निहित वास्तविकता हैं।
 
तात्पर्य
 उसके लिए जीवन प्रयोजनरहित है, जो अपने अत्यन्त हितैषी के प्रति अज्ञानी बना रहता है और उसकी पूजा नहीं करता। ऐसे व्यक्ति का श्वास लेना लुहार की धौंकनी के साँस लेने जैसा है। बद्धजीव के लिए मानव-जीवन की भेंट एक सुअवसर है, लेकिन अपने स्वामी से मुख मोड़ कर जीव आध्यात्मिक आत्महत्या कर लेता है। श्री ईशोपनिषद (३) के शब्दों में—
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता:।

तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना: ॥

“आत्मा का हन्ता, चाहे वह जो कोई भी हो, उसे श्रद्धाविहीन अंधकार तथा अज्ञान से पूर्ण लोकों के नाम से अभिहित लोकों में प्रवेश करना होगा।” असूर्या: का अर्थ है “दानवों द्वारा प्राप्त किया जाना” और दानव ऐसे व्यक्ति हैं, जिनमें भगवान् विष्णु के प्रति कोई भक्ति नहीं होती। अग्नि पुराण में यह परिभाषा दी गई है—

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च।

विष्णुभक्तिपरो दैव आसुरस्तद्विपर्यय: ॥

“इस संसार में दो प्रकार की उत्पन्न प्राणी हैं दैवी तथा दानवी। जो भगवान् विष्णु की भक्ति में लगे रहते हैं, वे दैवी हैं और जो ऐसी सेवा के विरोधी हैं, वे दानवी हैं।”

इसी तरह बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है न चेद् अवेदीन् महती विनष्टि:... ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुखम् एवोपयन्ति—यदि कोई व्यक्ति ब्रह्म को नहीं जानता तो उसको सर्वनाश देखना पड़ता है...जो ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं, वे अमर हो जाते हैं, किन्तु अन्य लोगों को अवश्य ही दुख भोगना पड़ता है। अज्ञान से जनित कष्ट से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को अपनी कृष्णचेतना को जागृत करना चाहिए, किन्तु जिस विधि से इसे किया जाता है उसका कठिन होना आवश्यक नहीं है, जैसाकि भगवान् कृष्ण हमें भगवद्गीता (९.३४) में आश्वासन देते हैं—

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्परायण: ॥

“अपने मन को सदैव मेरा चिन्तन करने में लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे ही नमस्कार करो तथा मेरी पूजा करो। पूरी तरह से मुझमें लीन होने पर तुम अवश्य ही मेरे पास आओगे।” अयोग्यताओं तथा दुर्बलताओं के बावजूद मनुष्य को स्वेच्छा से अनुविध अर्थात् भगवान् का विश्वासपात्र तथा विश्वासी दास बन जाना चाहिए। कठ उपनिषद् की घोषणा है (२.२.१३) नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् एको बहूनां यो विदधाति कामान्।

तं पीठगं येऽनुपश्यन्ति धीरास् तेषां शान्ति: शाश्वती नेतरेषाम् ॥

“समस्त नित्य एवं चेतन जीवों में एक ऐसा है, जो हर एक की आवश्यकताएँ पूरी करता है। जो बुद्धिमान आत्माएँ उनके धाम में उनकी पूजा करती हैं, उन्हें शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है। अन्य को नहीं।”

क्या जीवित है और क्या मृत है? भौतिकतावादी अभक्तों के शरीर तथा मन जीवन के लक्षण तो प्रदर्शित करते हैं, लेकिन यह स्वरूप भ्रामक है। वस्तुत: बद्धजीव का अपने शारीरिक अस्तित्व पर कोई नियंत्रण नहीं रहता। अपनी इच्छा के विरुद्ध वह मल त्यागता है, समय समय पर बीमार पड़ता है और वृद्ध होकर अन्त में मर जाता है। वह अपने मन में अनिच्छित ही क्रोध, लालसा तथा शोक का भोग करता है। भगवान् कृष्ण इस स्थिति को यन्त्रारूढानि मायया (भगवद्गीता १८.६१) कहते हैं अर्थात् यात्री-यंत्र में असहाय-सा आरूढ़ होना। आत्मा तो निस्सन्देह जीवित रहता है और इसका जीना अटल है, लेकिन अपने अज्ञान के कारण आन्तरिक जीवन प्रच्छन्न तथा विस्मृत रहता है। इसके स्थान पर बाह्य मन तथा शरीर प्रकृति के गुणों के आदेश पालन करते हैं, जिससे मनुष्य आत्मा की सुप्त आवश्यकताओं से असम्बद्ध होकर कर्म करता है। श्वेताश्वतर उपनिषद् (२.५) माया के इन भुलक्कड़ बन्दियों को पुकार पुकार कर कहती है—

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्त पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु:।

“हे अमरता के पुत्रो, जो कभी दैवी लोक में वास करते थे, सुनो!”

अतएव एक ओर सामान्यतया जिसे सजीव माना जाता है यह भौतिक शरीर वास्तव में मृत यंत्र है, जो प्रकृति के गुणों द्वारा संचालित है। दूसरी ओर भौतिकतावादी जिसे शोषण के लिए जड़ पदार्थ मानता है, वह अज्ञात अनिवार्यता से सजीव बुद्धि से सम्बन्धित होता है, जो उसकी अपनी बुद्धि से अधिक शक्तिशाली है। प्रकृति के पीछे जो बुद्धि कार्य करती है, उसे वैदिक सभ्यता उन देवताओं से सम्बन्धित मानती है, जो विविध तत्त्वों के अधिष्ठाता हैं और अन्त में इसे स्वयं भगवान् से सम्बन्धित मानती है। वस्तुत: पदार्थ किसी सजीव शक्ति की प्रेरणा तथा निर्देशन के बिना ठीक से कार्य नहीं कर सकता। जैसाकि कृष्ण ने भगवद्गीता (९.१०) में कहा है—

मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्।

हेतुनानेन कौन्तेय जगद् विपरिवर्तते ॥

“हे कुन्ती-पुत्र! यह भौतिक प्रकृति, जो कि मेरी एक शक्ति है मेरी अध्यक्षता में कार्य कर रही है और समस्त जड़ तथा चेतन प्राणियों को उत्पन्न करती है। उसके शासन के अन्तर्गत ही यह जगत बारम्बार उत्पन्न होता है और नष्ट होता है।”

सृष्टि के प्रारम्भ में महाविष्णु ने सुप्त प्रकृति पर दृष्टि डाली। अत: जागकर सूक्ष्म प्रकृति अधिक संहत स्वरूपों को जन्म देने लगी पहले पहल महत् बना, फिर प्रकृति के तीनों गुणों के संयोग से अहं और तब धीरे धीरे विभिन्न तत्त्व यथा बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ तथा पाँच भौतिक तत्त्व और उनके अधिष्ठाता देवता बने। किन्तु पृथक् रूप पा चुकने के बाद भी ये देवता जो विविध तत्त्वों के अधिष्ठाता हैं, तब तक दृश्य जगत का निर्माण नहीं कर पाये, जब तक भगवान् विष्णु ने अपनी विशेष कृपा प्रदान करके एक बार फिर अन्तराक्षेप नहीं किया। इसका वर्णन श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध (३.५.३८-३९) में मिलता है—

एते देवा: कला विष्णो: कालमायांशलिंगिन:।

नानात्वात् स्वक्रियानीशा: प्रोचु: प्राञ्जलयो विभुम् ॥

देवा ऊचु: ननाम ते देव पदारविन्दं प्रपन्नतापोपशमातपत्रम्।

यन्मूलकेता यतयोऽञ्जसोरुसंसारदु:खं बहिरुत्क्षिपन्ति ॥

“इन भौतिक तत्त्वों के अधिष्ठाता देव भगवान् विष्णु के शक्त्याविष्ट अंश हैं। वे बहिरंगा शक्ति के अधीन शाश्वत काल द्वारा देह पाते हैं और वे उनके विभिन्नांश हैं। जब उन्हें विश्व के विविध कार्य सौंप दिये गये और वे उन्हें नहीं कर पाये, तो उन्होंने भगवान् की सम्मोहक स्तुति की। देवताओं ने कहा, “हे प्रभु! आपके चरणकमल शरणागतों के लिए छाते के समान हैं, जो समस्त भौतिक क्लेशों से उनकी रक्षा करते हैं। सारे ऋषि-मुनि उसी की छाया में समस्त भौतिक क्लेशों से छूट जाते हैं। अतएव हम आपके चरणकमलों को सादर नमस्कार करते हैं।”

एकत्र हुए उन तत्त्वों के देवों की प्रार्थना सुनकर भगवान् ने उन पर कृपा प्रदर्शित की (भागवत ३.६.१-३) इति तासां स्वशक्तीनां सतीनाम् असमेत्य स:।

प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वर: ॥

कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिम् उरुक्रम:।

त्रयोविंशति तत्त्वानां गणं युगपद् आविशत् ॥

सोऽनुप्रविष्टो भगवांश्चेष्टारूपेण तं गणम्।

भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥

“इस तरह भगवान् ने अपनी शक्तियों यथा महत् तत्त्व के संयोग न होने से ब्रह्माण्ड के सृजन- कार्य को ठप होते सुना। तब परम शक्तिमान भगवान् अपनी बहिरंगा शक्ति देवी काली सहित तेईसों तत्त्वों के भीतर एक ही समय प्रविष्ट हुए। यह काली देवी ही समस्त तत्त्वों को एक में मिलाने वाली है। इस तरह जब भगवान् अपनी शक्ति के द्वारा तत्त्वों में प्रविष्ट हो गये, तो सारे जीव जागकर विभिन्न कर्मों में लग गये, जिस तरह कोई व्यक्ति निद्रा से जाग कर अपना कार्य करने लगे।”

श्रील प्रभुपाद ने भगवान् श्रीकृष्ण में आत्मा को आच्छादित करने वाले अहंकार के पाँच कोशों की व्याख्या की है, “शरीर के भीतर जीवन के पाँच विभिन्न विभाग हैं, जो अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय नाम से जाने जाते हैं। [इनका उल्लेख तैत्तिरीय उपनिषद् के ब्रह्मानन्द वल्ली में हुआ है]। जीवन के प्रारम्भ में प्रत्येक प्राणी भोजन के प्रति सचेष्ट रहता है। बालक अथवा पशु केवल उत्तम भोजन पा कर ही सन्तुष्ट होते हैं। चेतना का यह स्तर, जिसमें भर-पेट भोजन ही ध्येय होता है, अन्नमय कहा जाता है। अन्न का अर्थ है भोजन। इसके बाद जीवित रहने की चेतना आती है। यदि बिना किसी आक्रमण या संहार के व्यक्ति अपना जीवन बिता सकता है, तो वह स्वयं को सुखी मानता है। इस स्थिति को प्राणमय अर्थात् अपने अस्तित्व के प्रति चेतना कहते हैं। इसके पश्चात् जब व्यक्ति मानसिक स्तर पर जीवित रहता है, तो उस चेतना को मनोमय कहते हैं। भौतिक सभ्यता मूलत: अन्नमय, प्राणमय तथा मनोमय—इन्हीं तीन कोशों पर आधारित है। सभ्य व्यक्तियों की प्रथम चिन्ता आर्थिक विकास, द्वितीय चिन्ता विनाश से सुरक्षा और इसके बाद मानसिक विचार की चेतना होती है, जो कि जीवन मूल्यों के प्रति दार्शनिक पक्ष है।

यदि दार्शनिक जीवन की विकास-प्रक्रिया द्वारा वह बौद्धिक जीवन के स्तर पर पहुँच जाता है और यह समझ पाता है कि वह यह भौतिक शरीर नहीं अपितु आत्मा है, तो वह विज्ञानमय अवस्था को प्राप्त होता है। तब आध्यात्मिक जीवन के विकास द्वारा वह भगवान् या परमात्मा को समझ पाता है। जब व्यक्ति भगवान् से अपना सम्बन्ध विकसित कर लेता है और भक्ति करता है, तो जीवन की वह अवस्था कृष्णभावनामृत अथवा आनन्दमय अवस्था कहलाती है। आनन्दमय ज्ञान तथा शाश्वतता का आनन्दपूर्ण जीवन है। जैसाकि वेदान्त सूत्र में कहा गया है—आनन्दमयोऽभ्यासात्। परब्रह्म तथा ब्रह्म अथवा भगवान् तथा जीव दोनों ही स्वभाव से आनन्दमय हैं। जब तक जीव अन्नमय, प्राणमय, मनोमय तथा विज्ञानमय नामक चार निम्न कोशों में रहते हैं, तब तक उन्हें जीवन की भौतिक अवस्था में स्थित माना जाता है। किन्तु जैसे ही वह आनन्दमय स्थिति को प्राप्त कर लेता है, वह मुक्तात्मा बन जाता है।

भगवद्गीता में इस आनन्दमय स्थिति को ब्रह्मभूत स्थिति कहा गया है। इस स्थिति में कोई उद्वेग अथवा कोई तृष्णा नहीं रह जाती। इस स्थिति का प्रारम्भ तब होता है, जब व्यक्ति समस्त जीवों पर समभाव रखने लगता है। इसके बाद इसका विस्तार कृष्णभावनामृत स्थिति में होता है, जिसमें व्यक्ति सदैव भगवत्सेवा के लिए लालायित रहता है। भक्ति में आगे बढऩे की यह लालसा भौतिक जगत में इन्द्रियतृप्ति की लालसा जैसी नहीं होती। दूसरे शब्दों में, आध्यात्मिक जीवन में भी लालसा रहती है, किन्तु वह निर्मल हो जाती है। जब हमारी इन्द्रियाँ निर्मल हो जाती हैं, तो वे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय तथा विज्ञानमय समस्त भौतिक स्थितियों से मुक्त हो जाती हैं और वे कृष्णभावनामृत के आनन्दमय जीवन में अर्थात् आनन्दमय नामक सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त होती हैं।

मायावादी दार्शनिक आनन्दमय स्थिति को परब्रह्म में लीन होने की स्थिति कहते हैं। उनके लिए आनन्दमय का अर्थ है : परमात्मा तथा जीवात्मा का तादात्म्य। किन्तु वास्तविक तथ्य यह है कि एकात्म हो जाने का अर्थ परब्रह्म में समा जाना और अपना व्यक्तिगत अस्तित्व खोना नहीं है। आध्यात्मिक अस्तित्व में लीन होने का अर्थ है कि जीव अपनी गुणात्मक एकता परमेश्वर के सत्-चित् गुणों के साथ समझ लेता है। वह समझ जाता है कि शाश्वतता तथा ज्ञान जैसे परमेश्वर के गुण उसमें भी हैं। वास्तविक आनन्दमय स्थिति तभी प्राप्त होती है, जब व्यक्ति भक्ति में संलग्न होता है। इस तथ्य की पुष्टि भगवद्गीता में की गई है। मद्भक्तिं लभते पराम्—ब्रह्मभूत आनन्दमय स्थिति तभी पूर्ण होती है, जब परमात्मा तथा अधीनस्थ जीवात्माओं के मध्य प्रेम का आदान-प्रदान होता है। जब तक व्यक्ति जीवन के इस आनन्दमय स्तर को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसका श्वास लेना लुहार की धौंकनी के श्वास लेने के समान है। उसकी आयु वृक्ष की आयु की तरह है और वह निम्नतर पशुओं जैसे ऊँट, शूकर तथा कुत्तों से किसी भाँति श्रेष्ठ नहीं है।”

माया के कोशों के भीतर जीव के साथ रहते हुए भी परमात्मा जीव की तरह कर्म के पाश से बँधा नहीं रहता। इन कोशों के साथ परमात्मा का सम्बन्ध वैसे ही रहता है, जैसे चन्द्रमा और वृक्ष की कुछ शाखाओं के बीच, जिनमें से चन्द्रमा दिखता है, होता है। परमात्मा सदसत: परम् अर्थात् अन्नमय आदि के सूक्ष्म तथा स्थूल रूपों से परे है, यद्यपि वह उनके भीतर समस्त कर्मों के साक्षी रूप में प्रवेश करता है। अन्तिम कारण के रूप में एक तरह से परमात्मा सृष्टि के व्यक्त पदार्थों से अभिन्न है, किन्तु उसकी आदि पहचान (स्वरूप ) पृथक् रहती है। इस दूसरे अर्थ में वह एकमात्र आनन्दमय है, जो कि पाँच कोशों में अन्तिम है। इसीलिए श्रुतियाँ उसे यहाँ पर अवशेषम् कहकर पुकारती हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में भी (२.७) यही बात कही गई है रसो वै स:। परमेश्वर अपने भीतर रस का आनन्द लेते हैं, जो कि भक्ति-रस के विनिमय स्वरूप है। रसों का कार्य अभिन्न अंगस्वरूप सिद्धजीवों का उसमें सम्मिलित होना है। रसो वै स:, रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति—वह साक्षात् रस है और जीव, जो इस रस की अनुभूति करता है पूर्णतया आनन्दमय हो जाता है। अर्थात् साक्षात् वेदों द्वारा इस श्लोक में कहे गये शब्दों के रूप में परमात्मा ऋतम् है, जिसकी व्याख्या श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ने “महर्षियों द्वारा अनुभूत” के रूप में की है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के मतानुसार समस्त प्रामाणिक शास्त्रों का अन्तिम शब्द (सर्वान्तिम श्रुति ) यह नीतिवाक्य—रसो वै स:—है, जो भगवान् श्रीकृष्ण के प्रसंग में दिव्य आनंद के अनंत प्रसारण के रूप में प्रदर्शित होता है (सर्ववृहत्तमानन्द )। गोपालतापनी उपनिषद् (उत्तर ९६) में कहा गया है—योऽसौ जाग्रत-स्वप्न सुषुप्तिम् अतीत्य तुर्यातीतो गोपाल:—गोप कृष्ण न केवल जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति की भौतिक चेतना को लाँघने वाला है अपितु शुद्ध आध्यात्मिक चेतना के चौथे क्षेत्र को भी लाँघ जाता है। आनन्दमय परमात्मा आदि गोविन्द का एक पक्ष है, जैसाकि उन्होंने स्वयं कहा है विष्टभ्याहम् इदं कृत्स्नम् एकांशेन स्थितो जगत्—मैं अपने एक अंश मात्र से इस समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त हूँ और इसका पालन करता हूँ (भगवद्गीता १०.४२)।

इस प्रकार श्रुतियाँ बड़ी ही विद्वतता से कहती हैं कि ईश्वर के अनेक साकार रूपों में भी कृष्ण सर्वोच्च हैं। यह समझते हुए नारद मुनि आगे चलकर भगवान् कृष्ण की स्तुति नमस्तस्मै भगवते कृष्णायामलकीर्तये (श्लोक ४६) शब्दों द्वारा करते हैं, यद्यपि वे भगवान् नारायण ऋषि के समक्ष खड़े हैं।

श्रील श्रीधर स्वामी इस श्लोक की टीका निम्नलिखित स्तुति के साथ समाप्त करते हैं— नरवपु: प्रतिपाद्य यदि त्वयि श्रवणवर्णनसंस्मरणादिभि:।

नरहरे न भजन्ति नृणाम् इदं दृतिवद् उच्छ्वसितं विफलं तत: ॥

“हे नरहरि! जिन लोगों ने यह मनुष्य-जीवन प्राप्त किया है, यदि वे आपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण तथा अन्य भक्ति-कार्य करके आपकी पूजा करने से चूक जाते है, तो वे व्यर्थ ही जीवित हैं और धौंकनी के समान ही श्वास लेते रहते हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥