श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 18

 
श्लोक
उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पद‍ृश:
परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो दहरम् ।
तत उदगादनन्त तव धाम शिर: परमं
पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
उदरम्—पेट; उपासते—पूजते हैं; ये—जो; ऋषि—ऋषियों की; वर्त्मसु—मानक विधियों के अनुसार; कूर्प—स्थूल; दृश:— उनकी दृष्टि; परिसर—जिससे सारी प्राणिक शाखाएँ (नाडिय़ाँ) फूटती हैं; पद्धतिम्—शिरोविन्दु; हृदयम्—हृदय; आरुणय:— आरुणि ऋषिगण; दहरम्—सूक्ष्म; तत:—तब से; उदगात्—(आत्मा) ऊपर उठता है; अनन्त—हे अनन्त; तव—तुम्हारा; धाम—प्रकट होने का स्थान; शिर:—सिर; परमम्—सर्वोच्च गन्तव्य; पुन:—फिर; इह—इस जगत में; यत्—जो; समेत्य— पहुँच कर; न पतन्ति—नीचे नहीं गिरते हैं; कृत-अन्त—मृत्यु के; मुखे—मुख में ।.
 
अनुवाद
 
 बड़े बड़े ऋषियों द्वारा निर्दिष्ट विधियों के अनुयायियों में से, जिनकी दृष्टि कुछ कम परिष्कृत होती है, वे ब्रह्म को उदर क्षेत्र में उपस्थित मानकर पूजा करते हैं, किन्तु आरुणिगण उसे हृदय में उपस्थित मानकर पूजा करते हैं, जो सूक्ष्म केन्द्र है जहाँ से सारी प्राणिक शाखाएँ (नाडिय़ाँ) निकलती हैं। हे अनन्त, ये पूजक अपनी चेतना को वहाँ से ऊपर उठाकर सिर की चोटी तक ले जाते हैं, जहाँ वे आपको प्रत्यक्ष देख सकते हैं। तत्पश्चात् सिर की चोटी से चरम गन्तव्य की ओर बढ़ते हुए वे उस स्थान पर पहुँच जाते हैं, जहाँ से वे पुन: इस जगत में, जो मृत्यु के मुख स्वरूप हैं, नहीं गिरेंगे।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ध्यानमय योग की शिक्षा देने वाली श्रुतियाँ भगवान् की महिमा का गान करती हैं। योग की विविध-विधियाँ अधिकतर धीमी हैं तथा विपथ कराने की आशंकाओ से भरे हैं। फिर भी योग की प्रामाणिक विधियाँ उस परमात्मा के ध्यान को अपना लक्ष्य बनाती हैं, जो जीवात्मा के साथ साथ हृदय-क्षेत्र में निवास करता है। हृदय में परमात्मा की अभिव्यक्ति अत्यन्त सूक्ष्म तथा अनुभव करने में कठिन (दहरम् ) है, अतएव बढ़े-चढ़े योगी ही उसका साक्षात्कार कर सकते हैं।
प्राय: नवदीक्षित ध्यान करने वाले लोग जीवती शक्ति के किसी निम्न केन्द्र में परमात्मा की गौण उपस्थिति पर ध्यान केन्द्रित करने का अभ्यास करते हैं यथा मूलाधार चक्र (रीढ़ की हड्डी के तले), स्वाधिष्ठान चक्र (गुदा-क्षेत्र में), मणिपूर चक्र (पेट में)। भगवान् कृष्ण मणिपूर चक्र में परमात्मा-रूप में अपने अंश का उल्लेख इस प्रकार करते हैं—

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमास्थित:।

प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥

“मैं समस्त जीवों के शरीरों में पाचन-अग्नि हूँ और मैं बाहर जाने वाली तथा भीतर आने वाली प्राण-वायु के साथ मिलकर चार प्रकार का भोजन पचाता हूँ।” (भगवद्गीता १५.१४) वैश्वानर देवता पाचन का अधिष्ठाता है और वह पशुओं, मनुष्यों तथा देवताओं को चलने-फिरने की क्षमता प्रदान करता है। इस श्लोक में बोल रही श्रुतियों के निर्णय के अनुसार जो लोग अपने ध्यान को भगवान् के इसी रूप तक सीमित रखते हैं, वे अल्पज्ञ हैं—कूर्पदृश: हैं जिसका शाब्दिक अर्थ है “धूल से धूमिल आँखों वाला।”

दूसरी ओर आरुणि नाम से विख्यात उच्च योगी ब्रह्म के उस रूप को पूजते हैं, जो जीव के संगी के रूप में हृदय के भीतर रहता है, जो अपने अधीनस्थ जीव को ज्ञान-शक्ति देता है और व्यावहारिक बुद्धि द्वारा उसे प्रेरित करता है। जिस तरह भौतिक हृदय रक्तसंचार का केन्द्र होता है, उसी तरह सूक्ष्म हृदय चक्र प्राण की असंख्य शाखाओं का, जिन्हें नाड़ी कहते हैं, मिलनस्थल है। ये नाडिय़ाँ बाहर की ओर शरीर के सारे भागों को जाती हैं। जब ये नाडिय़ाँ काफी शुद्ध कर दी जाती हैं, तो आरुणि योगीजन हृदय क्षेत्र को छोडक़र मस्तिष्क के तालु पर स्थित चक्र की ओर बढ़ते हैं। जो योगी इस ब्रह्मरन्ध्र चक्र से होकर अपना शरीर त्याग करते हैं, वे सीधे भगवद्धाम जाते हैं, जहाँ से लौटकर फिर से जन्म लेने की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस तरह ध्यानमय योग की अनिश्चित विधि भी ठीक से पालन किये जाने पर शुद्ध भक्ति का फल दे सकती है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ऐसे कई श्रुति मंत्र उद्धृत करते हैं, जो इस श्लोक के शब्दों को प्रतिध्वनित करते हैं: उदरं ब्रह्मेति शार्कराक्षा उपासते हृदयं ब्रह्मेत्यारुणयो ब्रह्मा है वैता इत ऊर्ध्वं त्वेवोदसर्पत् तच्छिरोऽश्रयते—जिनकी दृष्टि पर परदा पड़ा रहता है वे ब्रह्म की पहचान उदर से करते हैं, जबकि आरुणिजन ब्रह्म की पूजा हृदय में करते हैं। जिसने सचमुच ही ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, वह हृदय से ऊपर उठता हुआ सिर की चोटी पर भगवान् की शरण लेने पहुँचता है, जहाँ वे प्रकट होते हैं।”

शतं चैका च हृदयस्य नाड्य स्तासां मूर्धानमभिनि:सृतैका।

तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विश्व न्न अन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥

“हृदय से निकलने वाली १०१ सूक्ष्म नाडिय़ाँ हैं। इनमें से एक—सुषुम्ना—सिर की चोटी तक जाती है। इस नाड़ी से ऊपर की ओर होते हुए मनुष्य मृत्यु को पार कर जाता है। अन्य नाडिय़ाँ समस्त दिशाओं में जाती हैं, जो विविध प्रकार के पुनर्जन्म तुल्य हैं।” (छान्दोग्य उपनिषद् ८.६.६) उपनिषदों में अन्तर्यामी परमात्मा का बारम्बार उल्लेख मिलता है। श्री श्वेताश्वतर उपनिषद् (३.१२- १३) में परमात्मा का वर्णन निम्नवत् है—

महान् प्रभुर्वै पुरुष: सत्त्वस्यैष प्रवर्तक:।

सुनिर्मलां इमां प्राप्तिम् ईशानो ज्योतिरव्यय: ॥

अंगुष्ठमात्र: पुरुषोऽअन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्ट:।

हृदा मनीषा मनसाभिक्ल्प्तो य एतद् विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥

“इस ब्रह्माण्ड का विस्तार करने के लिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् पुरुष बनते हैं। वे योगियों के शुद्ध पूर्ण गन्तव्य हैं, जो तेजवान तथा अच्युत परम नियन्ता हैं। एक अँगूठे की माप वाले ये पुरुष समस्त जीवों के हृदयों में परमात्मा रूप में सदैव उपस्थित रहते हैं। बुद्धि का उचित प्रयोग करके मनुष्य उनका साक्षात्कार हृदय के भीतर कर सकता है। जो यह विधि सीख लेते हैं उन्हें अमरता प्राप्त होती है।”

अन्त में श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

उदरादिषु य: पुंसां चिन्तितो मुनिवर्त्मभि:।

हन्ति मृत्युभयं देवो हृद्गतं तमुपास्महे ॥

“आओ, हम उन भगवान् की पूजा करें, जो हृदय में वास करते हैं। जब मर्त्य प्राणी महर्षियों द्वारा स्थापित मानक विधियों से उदर में तथा शरीर के अन्य भागों में उनके अंशों के रूप में उनका ध्यान करते हैं, तो भगवान् मृत्यु के भय को विनष्ट करते हुए प्रत्युत्तर देते हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥