श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 20

 
श्लोक
स्वकृतपुरेष्वमीष्वबहिरन्तरसंवरणं
तव पुरुषं वदन्त्यखिलशक्तिधृतोंऽशकृतम् ।
इति नृगतिं विविच्य कवयो निगमावपनं
भवत उपासतेऽङ्‍‍घ्रिमभवं भुवि विश्वसिता: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
स्व—अपने द्वारा; कृत—उत्पन्न; पुरेषु—शरीरों में; अमीषु—इन; अबहि:—बाहरी रूप से नहीं; अन्तर—अथवा आन्तरिक रूप से; संवरणम्—जिसका वास्तविक विकास; तव—तुम्हारा; पुरुषम्—जीव; वदन्ति—वेद कहते हैं; अखिल—समस्त; शक्ति— शक्तियों के; धृत:—स्वामी के; अंश—अंशरूप; कृतम्—प्रकट; इति—इस प्रकार; नृ—जीव का; गतिम्—पद; विविच्य— निश्चित करके; कवय:—विद्वान मुनिजन; निगम—वेदों के; आवपनम्—खेत, जिसमें सारी भेंटें बोई जाती हैं; भवत:—आपके; उपासते—पूजा करते हैं; अङ्घ्रिम्—पैरों की; अभवम्—जो संसार का संहार करने वाले हैं; भुवि—पृथ्वी पर; विश्वसिता:— विश्वास रखने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 प्रत्येक जीव अपने कर्म द्वारा सृजित भौतिक शरीरों में निवास करते हुए, वास्तव में, स्थूल या सूक्ष्म पदार्थ से आच्छादित हुए बिना रहता है। जैसा कि वेदों में वर्णन हुआ है, ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह समस्त शक्तियों के स्वामी, आपका ही भिन्नांश है। जीव की ऐसी स्थिति को निश्चित करके ही, विद्वान मुनिजन श्रद्धा से पूरित होकर, आपके उन चरणकमलों की पूजा करते हैं, जो मुक्ति के स्रोत हैं और जिन पर इस संसार की सारी वैदिक भेंटें अर्पित की जाती हैं।
 
तात्पर्य
 बद्धजीवों के शरीरों के भीतर निवास करते समय न केवल भगवान् पूर्णतया अदूषित रहते हैं, अपितु सूक्ष्म जीवात्माएँ भी जन्म-मृत्यु के चक्र में से बारम्बार गुजरते समय अर्जित अज्ञान तथा काम के आवरणों से कभी छुई तक नहीं जातीं। इस प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद् (३.१०.५) इस स्तुति में साक्षात् वेद भौतिक शरीरों के निश्चित भोक्ता (जीवात्मा) को समस्त शक्तियों के दिव्य आगार, परमेश्वर, के अंशरूप में बतलाते हैं। इस सन्दर्भ भें अंशकृतम् अर्थात् उसके अंश जैसा बनाया हुआ को सही सही समझना होगा। जीव का न तो कभी सृजन होता है, न ही वह विष्णुतत्त्व अंश जैसा अंश है। परमात्मा सबों के द्वारा पूज्य है और अधीन जीव परमात्मा का पूजक होने के लिए है। परमेश्वर अपने व्यक्तित्व के असंख्य रूप प्रदर्शित करके अपनी लीलाएँ करता है, जबकि जीव को अपने संचित कर्मों के आदेशों के अनुसार अपना शरीर बदलने को बाध्य होना पड़ता है। श्री नारद पञ्चरात्र के अनुसार यत् तटस्थं तु चिद्रूपं स्वसंवेद्याद् विनिर्गतम्।
रञ्जितं गुणरागेण सजीव इति कथ्यते ॥

“तटस्था शक्ति जो स्वभावत: आध्यात्मिक है, स्व-सचेत संवित् शक्ति से उत्पन्न होती है और भौतिक गुणों के प्रति आसक्त होने से कलुषित हो जाती है, जीव कहलाती है।” यद्यपि जीवात्मा भी भगवान् कृष्ण का अंश है, किन्तु वह कृष्ण के स्वतंत्र अंश विष्णु से इस बात में भिन्न है कि वह वैधानिक स्थिति से आत्मा तथा पदार्थ के बीच तटस्थ है। महावराह पुराण में बतलाया गया है—

स्वांशश्चाथ विभिन्नांश इति द्विधा श इष्यते।

अंशिनो यत्तु सामर्थ्यं यत्स्वरूपं यथा स्थिति: ॥

तदेव नाणुमात्रोऽपि भेदं स्वांशांशिनो: क्वचित्।

विभिन्नांशोऽल्पशक्ति: स्यात् किञ्चित् सामर्थ्यमात्रयुक् ॥

“भगवान् दो प्रकार से जाना जाता है अपने स्वांश रूपों में तथा अपने भिन्नांशों के रूप में। स्वांशों तथा उनके स्रोत के मध्य कभी भी न तो सामर्थ्यों में, न रूपों या स्थितियों में कोई अनिवार्य भेद पाया जाता है। दूसरी ओर विभिन्नांशों में केवल अल्प शक्ति होती है, क्योंकि भगवान् की शक्ति का अल्प अंश ही इन्हें प्रदत्त किया जाता है।”

इस जगत में बद्धजीव इस तरह प्रकट होता है, मानो भीतर तथा बाहर से पदार्थ द्वारा आच्छादित हो। बाह्य रूप से स्थूल पदार्थ उसके शरीर तथा परिवेश के रूप में आच्छादित किये रहता है, जबकि भीतर से इच्छा तथा द्वेष उसकी चेतना को कोंचते रहते हैं। किन्तु स्वरूपसिद्ध मुनियों की दिव्य दृष्टि में ये दोनों प्रकार के आवरण निरर्थक हैं। तर्क द्वारा सारी भौतिक पहचानों का, जो आत्मा के स्थूल तथा सूक्ष्म आवरणों पर आधारित भ्रांत धारणाएँ हैं, निषेध कर देने पर विचारवान व्यक्ति यह पायेगा कि आत्मा तनिक भी भौतिक नहीं है, प्रत्युत यह दैवी आत्मा का स्फुलिंग है और भगवान् का दास है। यह समझ कर मनुष्य को भगवान् के चरणकमलों की पूजा करनी चाहिए। ऐसी पूजा वैदिक अनुष्ठान रूपी वृक्ष का पूर्ण विकसित पुष्प है। भगवान् के चरणकमलों के वैभव की अनुभूति होने पर जो धीरे धीरे वैदिक यज्ञों के करने से पनपती है, संसार से मोक्ष का फल अपने आप मिल जाता है और भगवान् की कृपा में अटूट श्रद्धा उत्पन्न होती है। इस जगत में रहते हुए भी यह सब प्राप्त किया जा सकता है। भगवान् कृष्ण ने गोपालतापनी उपनिषद् (उत्तर ४७) में कहा है—

मथुरामण्डले यस्तु जम्बूद्वीपे स्थितोऽथ वा।

योऽर्चयेत् प्रतिमां प्रति स मे प्रियतरो भुवि ॥

“जो व्यक्ति मथुरा जनपद में या जम्बूद्वीप में कहीं भी रहकर मेरे अर्चाविग्रह के रूप में मेरी पूजा करता है, वह इस जगत में मेरा सर्वाधिक प्रिय बन जाता है।”

श्रील श्रीधर स्वामी स्तुति करते हैं—

त्वदंशस्य ममेशान त्वन्मायाकृतबन्धनम्।

त्वदंघ्रिसेवामादिश्य परानन्द निवर्तय ॥

“हे प्रभु! मैं आपका भिन्नांश हूँ, मुझे अपनी माया द्वारा बनाये हुए बन्धन से मुक्त कीजिये। हे परमानन्द के धाम! आप मुझे अपने चरणों की सेवा में लगाकर ऐसा कीजिये।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥