श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 87: साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति  »  श्लोक 21

 
श्लोक
दुरवगमात्मतत्त्वनिगमाय तवात्ततनो-
श्चरितमहामृताब्धिपरिवर्तपरिश्रमणा: ।
न परिलषन्ति केचिदपवर्गमपीश्वर ते
चरणसरोजहंसकुलसङ्गविसृष्टगृहा: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
दुरवगम—समझ पाना कठिन; आत्म—आत्मा का; तत्त्व—सत्य; निगमाय—प्रसार करने हेतु; तव—तुम्हारा; आत्त—धारण करने वाले; तनो:—आपके स्वरूप; चरित—लीलाओं के; महा—विस्तीर्ण; अमृत—अमृत के; अब्धि—सागर में; परिवर्त— गोता लगाकर; परिश्रमणा:—थकान से उबारे हुए; न परिलषन्ति—इच्छा नहीं करते; केचित्—कुछ ही व्यक्ति; अपवर्गम्—मोक्ष की; अपि—भी; ईश्वर—हे प्रभु; ते—तुम्हारे; चरण—चरणों पर; सरोज—कमल रूपी; हंस—हंसों के; कुल—समुदाय; सङ्ग—साथ; विसृष्ट—परित्यक्त; गृहा:—जिनके घर ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, कुछ भाग्यशाली आत्माओं ने आपकी उन लीलाओं के विस्तृत अमृत सागर में गोता लगाकर भौतिक जीवन की थकान से मुक्ति पा ली है, जिन लीलाओं को आप अगाध आत्म- तत्त्व का प्रचार करने के लिए साकार रूप धारण करके सम्पन्न करते हैं। ये विरली आत्माएँ, मुक्ति की भी परवाह न करके घर-बार के सुख का परित्याग कर देती हैं, क्योंकि उन्हें आपके चरणकमलों का आनन्द लूटने वाले हंसों के समूह सदृश भक्तों की संगति प्राप्त हो जाती है।
 
तात्पर्य
 आनुष्ठानिक ब्राह्मण (स्मार्त) तथा मायावादी लोग भक्तियोग की प्रक्रिया को तुच्छ ठहराते हैं। उनका कथन है कि भगवद्भक्ति तो भावुक व्यक्तियों की वस्तु है, जिनमें कठोर विधि विधानों को पालन करने या ज्ञान का कड़ा अनुशीलन करने की परिपक्वता का अभाव होता है। किन्तु इस श्लोक में साक्षात् वेद भक्ति की सर्वश्रेष्ठता की घोषणा कर रहे हैं और इसकी पहचान स्पष्टया आत्मतत्त्व के रूप में करते हैं, जिसे मायावादी बड़े गर्व से अपना क्षेत्र बतलाते हैं। श्रील जीव गोस्वामी इस आत्मतत्त्व की परिभाषा भगवान् के साकार रूपों, गुणों तथा लीलाओं के गुह्य रहस्य के रूप में देते हैं। वे आत्मतनो: का दूसरा अर्थ भी देते हैं, जो “विभिन्न शरीर धारण करने वाला” की बजाय “जो अपने दिव्य शरीर की ओर प्रत्येक को आकृष्ट करे” है।
भगवान् कृष्ण तथा उनके विविध अंशों और अवतारों की लीलाएँ आनन्द के अथाह सागर हैं। जब मनुष्य अपने भौतिक कार्यकलापों से पूरी तरह ऊब जाता है, चाहे वह भौतिक सफलता की तलाश में लगा हो, अथवा आध्यात्मिक संहार के निर्विशेष भाव में, तो वह इस अमृत में डुबकी लगाकर राहत प्राप्त कर सकता है। जैसाकि श्रील रूप गोस्वामी ने भक्तियोग के विज्ञान सम्बन्धी अपनी पुस्तक भक्तिरसामृतसिन्धु में कहा है कि जो कोई इस विस्तृत सागर की एक बूँद का भी आस्वादन कर लेता है, उसे किसी भी वस्तु की कोई इच्छा नहीं रह जाती।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती परिश्रमणा: शब्द की दूसरी व्याख्या करते हुए टीका करते हैं कि यद्यपि भक्तगण भगवान् की आनन्द-लीलाओं के सागर की अनंत लहरों तथा अन्तर्धाराओं में बारम्बार गोता लगाकर थक जाते हैं, किन्तु ये भक्तगण भगवान् की सेवा के अतिरिक्त कोई अन्य सुख नहीं चाहते, यहाँ तक कि मोक्ष-सुख भी नहीं। प्रत्युत उनकी थकान ही उनके लिए आनन्द बन जाती है, जिस तरह संभोग से उत्पन्न थकान यौन की लत वाले व्यक्ति को सुखद लगती है। भगवान् के शुद्ध भक्त भगवान् की लीलाओं की मनोहर कथाएँ सुनकर अनुप्राणित होते हैं और नाचने, गाने, जोर से चिल्लाने, अपनी एडिय़ों को पटकने, मूर्छित होने, सिसकने तथा उन्मत्तों की तरह इधर-उधर दौडऩे के लिए उत्प्रेरित हो जाते हैं। इस तरह वे शारीरिक थकान का अनुभव किये बिना आनन्द-विभोर रहते हैं।

शुद्ध वैष्णवों को तो मोक्ष भी नहीं चाहिए, अन्य ऐच्छिक लक्ष्यों जैसे स्वर्ग का शासक पद की तो बात ही नहीं उठती। इतना समर्पण-भाव इस जगत में निश्चित रूप से दुर्लभ है, जैसाकि इस श्लोक में श्रुतियों द्वारा प्रयुक्त केचित् शब्द से प्रकट होता है। शुद्ध भक्त न केवल भावी लाभ की लालसा का परित्याग कर देते हैं, अपितु सम्प्रति उनके पास जो कुछ यथा घर तथा पारिवारिक जीवन की सारी सामान्य सुख-सुविधाएँ होती हैं, उसके प्रति भी उनका आकर्षण जाता रहता है। उनके लिए सन्त वैष्णवों परम्परागत गुरुओं, शिष्यों तथा प्रशिष्यों—की संगति ही उनका असली परिवार बन जाता है, जिसमें श्री शुकदेव गोस्वामी जैसे हंस रूपी महापुरुष होते हैं। ये महापुरुष भगवान् के चरणकमलों की सेवा का मधुर अमृत नित्य ही पान करते हैं।

उपनिषदों तथा अन्य श्रुतियों के अनेक मंत्र मोक्ष की अपेक्षा भक्ति को खुले तौर पर श्रेष्ठ घोषित करने वाले हैं। नृसिंह पूर्व तापनी उपनिषद् के शब्दों के अनुसार—यं सर्वे वेदा नमन्ति मुमुक्षवो ब्रह्मवादिनश्च—सारे वेद, सारे मुमुक्ष तथा ब्रह्म के जिज्ञासु व्यक्ति उन्हें ही नमस्कार करते हैं। इस मंत्र की टीका करते हुए श्री शंकराचार्य यह स्वीकार करते हैं—मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भजन्ति—

मुक्तात्माएँ भी भगवान् का अर्चाविग्रह स्थापित करके उनकी पूजा करने में हर्ष अनुभव करते हैं। इस प्रसंग में आचार्य शंकर के महान् प्रतिद्वन्द्वी श्रील मध्वाचार्य आनन्दतीर्थ अपने प्रिय श्रुति-मंत्र उद्धृत करते हैं जैसे—मुक्ता ह्येतम् उपासते मुक्तानामपि भक्तिर्हि परमानन्दरूपिणी—“मुक्त लोग भी उनकी पूजा करते हैं और उनके लिए भी भक्ति परम आनन्द रूपिणी है।” तथा अमृतस्य धारा बहुधा दोहमानं। चरणं नो लोके सुधितां दधातु। ॐ तत्सत्—जिनके चरणों से अमृत की धारा बहती है वे चरण हम इस जगत के निवासियों को ज्ञान प्रदान करें।

संक्षेप में, श्रील श्रीधर स्वामी प्रार्थना करते हैं—

त्वत् कथामृत पाथोधौ विहरन्तो महामुद:।

कुर्वन्ति कृतिन: केचिच्चतुर्वर्गं तृणोपमम् ॥

“वे विरले भाग्यशाली व्यक्ति जो आपकी कथाओं के अमृत सागर में क्रीड़ा करके परम आनन्द प्राप्त करते हैं, वे जीवन के महान् चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) को तृणवत् समझते हैं।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥